अध्याय ३०

श्रीनारायण बोले – लोकों में तथा देवताओं में पति के समान कोई देवता नहीं है। जब पति प्रसन्न होते हैं तो समस्त मनोरथों को प्राप्त करती है। यदि पति कुपित होते हैं तो समस्त कामनायें नष्ट हो जाती हैं ॥ ९६ ॥

श्रीनारायण उवाच ॥ नैतादृशं दैवतमस्ति किञ्चित्सर्वेषु लोकेषु सदैवतेषु ॥ यदा पतिस्तुष्यति सर्वकामाँल्लहभ्यात्प्रकामं कुपितश्च हन्यात्‌ ॥ ९६ ॥

तस्मादपत्यं विविधाश्च भोगाः शय्यासनान्यद्भुतभोजनानि ॥ वस्त्राणि माल्यानि तथैव गन्धाः स्वर्गे च लोके विविधा च कोर्तिः ॥ ९७ ॥

इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पुरुषोत्तममासमाहात्म्ये श्रीनारायणनारदसंवादे पतिव्रताधर्मनिरूपणंनामत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३० ॥

उस पति से सन्तान, विविध प्रकार के भोग, शय्या, आसन, अद्‌भुत प्रकार के भोजन, वस्त्र, माला, सुगन्धित पदार्थ और इस लोक तथा स्वर्ग लोक में विविध प्रकार के यश मिलते हैं ॥ ९७ ॥

इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पुरुषोत्तममासमाहात्म्ये श्रीनारायणनारदसंवादे पतिव्रतधर्मनिरूपणं नाम त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३० ॥

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