अध्याय ३०

बाला हो, युवती हो अथवा वृद्धा हो परन्तु स्त्री स्वतन्त्रतापूर्वक अपने गृह में भी कुछ कार्य को नहीं करे ॥ ७ ॥

अहंकार और काम-क्रोध का सर्वदा त्याग कर पति के मन को सदा प्रसन्न करती रहे और दूसरे के मन को कभी भी प्रसन्न नहीं करे ॥ ८ ॥

जो स्त्री दूसरे पुरुष से कामना सहित देखी जाने पर, प्रिय वचनों से प्रलोभन देने पर अथवा जनसमुदाय में स्पर्श होने पर विकार को नहीं प्राप्त होती है ॥ ९ ॥

बालया वा युवत्या वा वृद्धया वापि योषिता ॥ न स्वातन्त्र्येण कर्त्तव्यं किञ्चित्‌ कार्यं गृहेष्वपि ॥ ७ ॥

अहङ्कारं विहायाथ कामक्रोधौ च सर्वदा ॥ मनसो रञ्जनं पत्युः कार्यं नान्यस्य कुत्रचित्‌ ॥ ८ ॥

सकामं वीक्षिताऽप्यन्यैः प्रियवाक्यैः प्रलोभिता ॥ स्पृष्टा वा जनसम्मर्दे न विकारमुपैति या ॥ ९ ॥

यावन्तो रोमकूपाः स्युः स्त्रीणां गात्रेषु निर्मिताः ॥ तावद्वर्षसहस्राणि नाकं ताः पर्युपासते ॥ १० ॥

पुरुषं सेवते नान्यं मनोवाक्कायकर्मभिः ॥ लोभिताऽपि परेणार्थैः सा सती लोकभूषणा ॥ ११ ॥

दौत्येन प्राथिता वाऽपि बलेन विघृताऽपि वा ॥ वस्त्राद्यैर्वासिता वापि नैवान्यं भजते सती ॥ १२ ॥

तो स्त्रियों के शरीर में जितने रोम होते हैं उतने हजार वर्ष तक यह स्त्री स्वर्ग में वास करती है ॥ १० ॥

दूसरे पुरुष के धन के लोभ देने पर जो स्त्री पर-पुरुष का मन, वचन, कर्म से सेवन नहीं करती है तो वह स्त्री लोक में भूषण और सती कही गई है ॥ ११ ॥

दूती के प्रार्थना करने पर भी, बलपूर्वक पकड़ी जाने पर भी, वस्त्र-आभूषण आदि से आच्छादित होने पर भी, जो स्त्री अन्य पुरुष की सेवा नहीं करती है तो वह सती कही जाती है ॥ १२ ॥

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