अध्याय ३०

जो दूसरे से देखी जाने पर नहीं देखती है और हँसाई जानेपर भी हँसती नहीं है, बात करने पर बोलती नहीं है वह उत्तम लक्षण वाली प्रतिव्रता स्त्री है ॥ १३ ॥

रूप यौवन से युक्त और गाने-नाचने में होशियार होने पर भी अपने अनुरूप पुरुष को देखकर विकार को नहीं प्राप्त होती है वह स्त्री सती है ॥ १४ ॥

सुरूपवान्‌, जवान, मनोहर कामिनियों का प्रिय ऐसे पर-पुरुष के मिलने पर भी जो स्त्री इच्छा नहीं करती है तो वह महासती कही गयी है ॥ १५ ॥

वीक्षिता वीक्षते नान्यैर्हासिता न हसत्यपि ॥ भाषिता भाषते नैव सा साध्वी साधुलक्षणा ॥ १३ ॥

रूपयौवनसम्पन्ना गीते नृत्येऽतिकोविदा ॥ स्वानुरूपं नरं दृष्ट्वा न याति विकृतिं सती ॥ १४ ॥

सुरूपं तरुणं रम्यं कामिनीनां च वल्लतभम्‌ ॥ या नेच्छति परं कान्तं विज्ञेया सा महासती ॥ १५ ॥

देवो मनुष्यो गन्धर्वः सतीनां नापरः प्रियः ॥ अप्रियं नैव कर्त्तव्यं पत्युः पत्न्या  कदाचन ॥ १६ ॥

भुङ्क्तेष भुक्तेन यथा पत्यौ दुःखिते दुःखिता च या ॥ मुदिते मुदिताऽत्यर्थं प्रोषिते मलिनाम्बर ॥ १७ ॥

सुप्तेत पत्यौ च या शेते पूर्वमेव प्रबुध्यति ॥ प्रविशेच्चैाव या वह्नौ याते भर्त्तरि पञ्चताम्‌ ॥ १८ ॥

पतिव्रताओं को पति के सिवाय दूसरा देवता, मनुष्य, गन्धर्व भी प्रिय नहीं होता, इसलिए स्त्री अपने पति का अप्रिय कभी नहीं करे ॥ १६ ॥

जो पति के भोजन करने पर भोजन करती है, दुःखित होने पर दुःखित होती है, प्रसन्न होने पर प्रसन्न होती है, परदेश जाने पर मैला वस्त्र को पहनती है ॥ १७ ॥

जो पति के सो जाने पर सोती है और पहले जागती है, पति के मरने पर अग्नि में प्रवेश करती है ॥ १८ ॥

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