अध्याय ३०

जो दूसरे को चित्त से नहीं चाहती है वह पतिव्रता स्त्री है। सास, श्वरसुर में भक्ति करती है और विशेष करके पति में भक्ति करती है ॥ १९ ॥

धर्म कार्य में अनुकूल रहती है, धन-संचय में अनुकूल, गृह के कार्य में प्रतिदिन तत्पर रहने वाली है ॥ २० ॥

खेत से, वन से, ग्राम से पति के आने पर स्त्री उठकर आसन और जल देकर प्रसन्न करे ॥ २१ ॥

नान्यं कामयते चित्ते सा विज्ञेया पतिव्रता ॥ भक्तिं श्वशुरयोः कुर्यात्‌ पत्युश्चापि विशेषतः ॥ १९ ॥

धर्मकार्येऽनुकूलत्वमर्थकार्येऽपि सञ्चये ॥ गृहोपस्करसंस्कारे सक्ता या प्रतिवासरम्‌ ॥ २० ॥

क्षेत्राद्वनाद्वा ग्रामाद्वा भर्त्तारं गृहमागतम्‌ ॥ प्रत्युत्थायाभिनन्देत आसनेनोदकेन च ॥ २१ ॥

प्रसन्नवदना नित्यं काले भोजनदायिनी ॥ भुक्तवन्तं तु भर्त्तारं न वदेदप्रियं क्कचित्‌ ॥ २२ ॥

आसने भोजने दाने सम्माने प्रियभाषणे ॥ दक्षया सर्वदा भाव्यं भार्यया गृहमुख्यया ॥ २३ ॥

गृहव्ययनिमित्तं च यद्‌द्रव्यं प्रभुणाऽपितम्‌ ॥ निर्वृत्य गृहकार्यं सा किञ्चिद्‌ बुद्धयाऽवशेषयेत्‌ ॥ २४ ॥

नित्य प्रसन्नमुख रहे, समय पर भोजन देवे, भोजन करते समय कभी भी खराब वाणी नहीं कहे ॥ २२ ॥

गृह में प्रधान स्त्री सदा आसन, भोजन, दान, सम्मान, प्रिय भाषण में तत्पर रहे ॥ २३ ॥

गृह के खर्च के लिये स्वामी ने जो धन दिया है उससे घर के कार्य को करके बुद्धिपूर्वक कुछ बचा लेवे ॥ २४ ॥

Pages: 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15 16 17