अध्याय ३०

दान के लिये दिये हुए धन में से लोभ करके, कुछ कोरकसर नहीं करे और बिना पति की आज्ञा के अपने बन्धुओं को धन नहीं देवे ॥ २५ ॥

दूसरे के साथ बातचीत, असन्तोष, दूसरे पुरुष के व्यापार की बातचीत, अत्यन्त हँसना, अत्यन्त रोष और क्रोध को पतिव्रता स्त्री छोड़ देवे ॥ २६ ॥

पति जिस वस्तु का पान नहीं करता है, जिस वस्तु को खाता नहीं है, जिस वस्तु का भोजन नहीं करता है उन सब वस्तुओं का पतिव्रता स्त्री त्याग करे ॥ २७ ॥

त्यागार्थमपिते द्रव्ये लोभात्‌ किञ्चिन्न धारयेत्‌ ॥ भर्त्तुराज्ञां विना नैव स्वबन्धुभ्यो दिशेद्धनम्‌ ॥ २५ ॥

अन्यालापमसन्तोषं परव्यापारसंकथाः ॥ अतिहासातिरोषं च क्रोधं च परिवर्जयेत्‌ ॥ २६ ॥

यच्च भर्त्ता न पिबति यच्च भर्त्ता न खादति ॥ यच्च भर्त्ता न चाश्ना॥ति सर्वं तद्वर्जयेत्‌ सती ॥ २७ ॥

तैलाभ्यङ्गं तथा स्नानं शरीरोद्वर्तनक्रियाम्‌ ॥ मार्जनं चैव दन्तानां कुर्यात्‌ पतिमुदे सती ॥ २८ ॥

त्रेताप्रभृति नारीणां मासिमास्यार्त्तवं मुने ॥ तदा दिनत्रयं त्यक्त्वा शुद्धा स्याद्‌गृहकर्मणि ॥ २९ ॥

प्रथमेऽहनि चाण्डाली द्वितीये ब्रह्मघातिनी ॥ तृतीये रजकी प्रोक्ता चतुर्थेऽहनि शुद्‌ध्यति ॥ ३० ॥

तैल लगाना, स्नान, शरीर में उबटन लगाना, दाँतों की शुद्धि, पतिव्रता स्त्री पति की प्रसन्नता के लिये करे ॥ २८ ॥

हे मुने! त्रेतायुग से स्त्रियों को प्रतिमास रजोदर्शन होता है उस दिन से तीन दिन त्याग कर गृहकार्य के लिये शुद्ध होती है ॥ २९ ॥

प्रथम दिन चाण्डाली है, दूसरे दिन ब्रह्मघातिनी है, तीसरे दिन रजकी है। चतुर्थ दिन शुद्ध होती है ॥ ३० ॥

Pages: 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15 16 17