अध्याय ३०

स्नान, शौच, गाना, रोदन, हँसना, सवारी पर चढ़ना, मालिश, स्त्रियों के साथ जूआ खेलना, चंदनादि लगाना ॥ ३१ ॥

विशेष करके दिन में शयन, दतुअन करना, मानसिक अथवा वाचिक मैथुन करना, देवता का पूजन करना ॥ ३२ ॥

देवताओं को नमस्कार रजस्वला स्त्री नहीं करे। रजस्वला का स्पर्श और उसके साथ बातचीत नहीं करे ॥ ३३ ॥

स्नानं शौचं तथा गानं रोदनं हसनं तथा ॥ यानमभ्यञ्जनं नारी द्यूतं चैवानुलेपनम्‌ ॥ ३१ ॥

दिवास्वापं विशेषेण तथा वै दन्तधावनम्‌ ॥ मैथुनं मानसं वापि वाचिकं देवतार्चनम्‌ ॥ ३२ ॥

वर्जयेच्च नमस्कारं देवतानां रजस्वला ॥ रजस्वलायाः संस्पर्शं सम्भाषां च तथा सह ॥ ३३ ॥

त्रिरात्रं स्वमुखं नैव दर्शयेच्च रजस्वला ॥ स्ववाक्यं श्रावयेन्नैव यावत्स्नाता न शुद्धितः ॥ ३४ ॥

स्‍नात्वाऽन्यं पुरुषं नारी न पश्ये च्च रजस्वला ॥ ईक्षेत भास्करं देवं ब्रह्मकूर्चं ततः पिबेत्‌ ॥ ३५ ॥

केवलं पञ्चगव्यं च क्षीरं वाऽत्मविशुद्धये ॥ यथोपदेशं नियता वर्तयेद्धि वराङ्गना ॥ ३६ ॥

रजस्वला तीन रात तक अपने मुख को नहीं दिखाये। जब तक शुद्धिस्नान नहीं करे तब तक अपने वचनों को नहीं सुनावे ॥ ३४ ॥

रजस्वला स्त्री स्नान कर दूसरे पुरुष को नहीं देखे, सूर्यनारायण को देखे, बाद पंचगव्य का पान करे ॥ ३५ ॥

अपनी शुद्धि के लिये केवल पंचगव्य अथवा दूध का पान करे। श्रेष्ठ स्त्री कहे हुए नियम में स्थित रहे ॥ ३६ ॥

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