अध्याय ३०

यदि स्त्री गर्भवती हो जाय तो नियम में तत्पर रहे, वस्त्र-आभूषण अलंकार आदि से अलंकृत रहे और पति के प्रिय करने में यत्न्पूर्वक तत्पर रहे ॥ ३७ ॥

प्रसन्नमुख रहे, अपने धर्म में तत्पर रहे और शुद्ध रहे, अपनी रक्षा कर विभूषित रहे और वास्तुपूजन में तत्पर रहे ॥ ३८ ॥

खराब स्त्रियों के साथ बातचीत न करे, सूप की हवा शरीर में नहीं लगे, मृतवत्सा आदि का संसर्ग, दूसरे के यहाँ भोजन गर्भवती स्त्री नहीं करे ॥ ३९ ॥

गर्भिणी चेद्भवेन्नारी तदा नियमतत्परा ॥ अलंकृता सुप्रयता भर्त्तुः प्रियहिते रता ॥ ३७ ॥

तिष्ठेत्‌ प्रसन्नवदना स्वधर्मनिरता शुचिः ॥ कृतरक्षा सुभूषा च वास्तुपूजनतत्परा ॥ ३८ ॥

कुस्त्रीभिर्नाभिभाषेत शूर्पवातं च वर्जयेत्‌ ॥ मृतवत्सादिसंसर्गं परपाकं च सुन्दरी ॥ ३९ ॥

न बीभत्सं किञ्चिदीक्षेन्न रौद्रां श्रृणुयात्‌ कथाम्‌ ॥ गुरुं वात्युष्णमाहारमजीर्णं न समाचरेत्‌ ॥ ४० ॥

अनेन विधिना साध्वी शोभनं षुत्रमाप्नुयात्‌ ॥ अन्यथा गर्भपतनं स्तम्भनं वा प्रपद्यते ॥ ४१ ॥

हीनां निजगुणैरन्यां सपत्नीं नैव गर्हयेत्‌ ॥ ईर्ष्यारागसमुद्‌भूते विद्यमानेऽपि मत्सरे ॥ ४२ ॥

भद्दी चीज को नहीं देखे, भयंकर कथा को नहीं सुने, गरिष्ठ और अत्यन्त उष्ण भोजन नहीं करे और अजीर्ण न हो ऐसा भोजन करे ॥ ४० ॥

इस विधि से रहने पर पतिव्रता स्त्री श्रेष्ठ पुत्र को प्राप्त करती है, अन्यथा गर्भ गिर जाय, अथवा स्तम्भन हो जाय ॥ ४१ ॥

अपने गुणों से हीन दूसरी सौत की निन्दा नहीं करे, ईर्ष्या, राग से होनेवाले मत्सरता आदि के होने पर भी ॥ ४२ ॥

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