अध्याय ३०

सौत स्त्री परस्पर में अप्रिय वचन नहीं कहे, दूसरे के नाम का गान न करे और दूसरे की प्रशंसा नहीं करे ॥ ४३ ॥

पति से दूर वास नहीं करे, किन्तु पति के समीप में वास करे और पति के कहे हुए स्थान में, पृथिवी पर पति के सामने मुख करके वास करे ॥ ४४ ॥

स्वतन्त्रता पूर्वक दिशाओं को न देखे और दूसरे पुरुष को नहीं देखे। विलास पूर्वक पति के मुखकमल को देखे ॥ ४५ ॥

अप्रियं नैव कर्तव्यं सपत्नीभिः परस्परम्‌ ॥ न गायेदन्यनामानि न कुर्यादन्यवर्णनम्‌ ॥ ४३ ॥

न वसेद्‌दूरतः पत्युः स्थेयं वल्लूभसन्निधौ ॥ निदिष्टे च महीभागे वल्लकभाभिमुखा वसेत्‌ ॥ ४४ ॥

नावलोक्या दिशःस्वैरं नावलोक्यः परोजनः ॥ विलासैरवलोक्यंस्यात्‌ पत्युराननपङ्कजम्‌ ॥ ४५ ॥

कथ्यमाना कथा भर्त्रा श्रोतव्या सादरं स्त्रिया ॥ पत्युः सम्भाषणस्याग्रे नान्यत्‌ सम्भाषयेतस्वयम्‌ ॥ ४६ ॥

आहूता सत्वरं गच्छेद्रतिस्थानं रतोत्सुका ॥ पत्यौ गायति सोत्साहं श्रोतव्यं हृष्टचेतसा ॥ ४७ ॥

गायन्तं च पतिं दृष्ट्वा भवेदानन्दनिर्वृता ॥ भर्तुः समीपे न स्थेयं सोद्वेगं व्यग्रचित्तया ॥ ४८ ॥

पति से कही जाने वाली कथा को आदर पूर्वक स्त्री श्रवण करे। पति के भाषण के समय स्वयं स्त्री बातचीत नहीं करे ॥ ४६ ॥

रति में उत्कण्ठा वाली स्त्री पति के बुलाने पर, शीघ्र रतिस्थान को जाय। पति के उत्साह पूर्वक गाने के समय स्त्री प्रसन्नचित्त से श्रवण करे ॥ ४७ ॥

गाते हुये पति को देख कर स्त्री आनन्द में मग्न हो जावे, पति के समीप व्यग्र (चंचल) चित्त से व्याकुल हो नहीं बैठे ॥ ४८ ॥

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