अध्याय ३०

कलह के योग्य होने पर भी पति के साथ स्त्री कलह न करे। पति से भर्त्सित होने पर, निन्दा की जाने पर, ताड़ित होने पर भी पतिव्रता स्त्री ॥ ४९ ॥

व्यथित (दुःखित) होने पर भी भय छोड़ कर पति को कण्ठ से लगावे, ऊँचे स्वर से रोदन न करे और पति को कोसे नहीं ॥ ५० ॥

स्त्री अपने गृह से बाहर भाग कर न जाय, यदि बन्धुओं के यहाँ उत्सव आदि में जाय तो ॥ ५१ ॥

कलहो न विधातव्यः कलियोग्ये प्रिये स्त्रिया ॥ भर्त्सिता निन्दिताऽत्यर्थं ताडिताऽपि पतिव्रता ॥ ४९ ॥

व्यथिताऽपि भयं त्यक्त्वा कण्ठे गृह्णीत वल्ल॥भम्‌ ॥ उच्चैिर्न रोदनं कुर्यान्नैवाक्रोशेच्च  तं प्रति ॥ ५० ॥

पलायनं न कर्त्तव्यं निजगेहाद्‌बहिः स्त्रिया ॥ उत्सवादिषु बन्धूनां सदनं यदि गच्छति ॥ ५१ ॥

लब्ध्वाऽनुज्ञां तदा पत्युर्गच्छेदध्यक्षरक्षिता ॥ न वसेत्‌ सुचिरं तत्र प्रत्यागच्छेद्‌गृहं सती ॥ ५२ ॥

प्रस्थानाभिमुखे पत्यौ नासन्मङ्गल भाषिणी ॥ न वार्योऽसौ निषेधोक्त्या न कार्यं रोदनं तदा ॥ ५३ ॥

अकृत्वोद्वर्त्तनं नित्यं पत्यौ देशान्तरे गते ॥ वधूर्जीवनरक्षार्थं कर्म कुर्यादनिन्दितम्‌ ॥ ५४ ॥

पति की आज्ञा को लेकर और अध्यक्ष (रक्षक) से रक्षित होकर जाय और वहाँ अधिक समय तक वास न करे, पतिव्रता स्त्री अपने घर को लौट आवे ॥ ५२ ॥

पति के विदेशयात्रा के समय अमंगल वचन को न बोले, निषेध वचन से मना न करे और उस समय रोदन न करे ॥ ५३ ॥

पति के देशान्तर जाने पर नित्य उबटन न लगावे और जीवन रक्षा के लिये स्त्री निन्दित कर्म को न करे ॥ ५४ ॥

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