अध्याय ३१

हे गिरिसुते! जो-जो उत्तम दान कहे हैं वे सब श्रीकृष्ण के प्रिय पुरुषोत्तम मास में गौण हो गये हैं ॥ ७ ॥

हे सुन्दरि! कहीं भी ऐसा दान नहीं है जिसको श्रीपुरुषोत्तम मास में करने से तुम्हारा व्रत पूर्ण हो ॥ ८ ॥

हे अंगने! इस पुरुषोत्तम मास व्रत की पूर्ति के लिये सम्पुटाकार ब्रह्माण्ड का दान है उसको देना चाहिये ॥ ९ ॥

यद्यद्दानं गिरिसुते ह्युत्तमं परिकीतितम्‌ ॥ श्रीकृष्णवल्लाभे मासि तत्सर्वं गौणतां गतम्‌ ॥ ७ ॥

तस्मादेतादृशं दानं नैवास्ति क्वापि सुन्दरि ॥ येन ते व्रतसम्पूर्तिर्भ वेच्छ्रीपुरुषोत्तमे ॥ ८ ॥

पुरुषोत्तममासेऽस्मिन्‌ व्रतसम्पूर्णहेतवे ॥ ब्रह्माण्डं सम्पुटाकारं तदर्हं देयमङ्गने ॥ ९ ॥

न शक्यं तत्तु केनापि दातुं क्वापि वरानने ॥ तस्मादेतत्प्रतिनिधि कृत्वा कांस्यस्य सम्पुटम्‌ ॥ १० ॥

तन्मध्ये पूरयित्वैवापूपांस्त्रिंशन्मितान्मुदा ॥ सप्ततन्तुभिरावृत्य सम्पूज्य विधिवत्प्रिये ॥ ११ ॥

देयं विप्राय विदुषे व्रतसम्पूर्तिहेतवे ॥ एवं त्रिंशन्मितान्येव देयानि सति वैभवे ॥ १२ ॥

हे वरानने! वह दान किसी से देने योग्य नहीं है। इस ब्रह्माण्ड के बदले में काँसे का सम्पुट बनाकर ॥ १० ॥

हे प्रिये! उसके भीतर प्रसन्नता से ३० मालपूआ रखकर, सात तन्तु से बाँध कर, विधिपूर्वक पूजन करके ॥ ११ ॥

व्रतपूर्ति के लिये विद्वान्‌ ब्राह्मण को देवे। यदि विभव हो तो तीस सम्पुट देवे ॥ १२ ॥

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