अध्याय ३१

धूर्जटि भगवान्‌ के उपकारक और सुन्दर वचन को सुनकर पार्वती प्रसन्न हो गईं ॥ १३ ॥

हे नारद! पार्वती तीस काँसे के सम्पुट को विद्वान्‌ ब्राह्मणों को देकर तथा व्रतविधि को पूर्ण कर अत्यन्त प्रसन्न हुईं ॥ १४ ॥

सूतजी बोले – हे विप्र लोग! इस प्रकार नारद मुनि नारायण की वाणी सुन अत्यन्त तृप्त हो बारम्बार नमस्कार कर पुनः बोले ॥ १५ ॥

इत्याकर्ण्य वचो रम्यं धूर्जटेरुपकारकम्‌ ॥ अबीभवदुमा हृष्टा सर्वलोकहितैषिणी ॥ १३ ॥

त्रिंशत्कांस्यानि विद्वद्‌भ्यः सम्पुटानि व्यतीर्य सा ॥ पूर्णं व्रतविधिं कृत्वा मुमोदातीव नारदः ॥ १४ ॥

सूत उवाच ॥ इत्याकर्ण्य मुनिविप्रा नारायणवचोऽमृतम्‌ ॥ पुनराहातितृप्ताऽसौ नामं नामं पुनः पुनः ॥ १५ ॥

नारद उवाच ॥ सर्वेभ्यः साधनेभ्योऽयं मासः श्रीपुरुषोत्तमः ॥ वरीयान्निश्चतयो मेऽद्य श्रुत्वा माहात्म्यमुत्तमम्‌ ॥ १६ ॥

श्रुत्वापि जायते भक्त्या महापापक्षयो नृणाम्‌ ॥ किं पुनः श्रद्धया कर्तुविधिना चेति मे मतिः ॥ १७ ॥

अतः परं न किञ्चिन्मे श्रोतव्यमवशिष्यते ॥ पीयूषात्यन्तसन्तृप्ता नान्यत्तोयं समीहते ॥ १८ ॥

नारद मुनि बोले – सब साधनों से श्रेष्ठ यह पुरुषोत्तम मास है। इसका उत्तम माहात्म्य सुन मेरे को ऐसा निश्चय हुआ ॥ १६ ॥

केवल भक्ति पूर्वक श्रवण करने से भी मनुष्यों के महान्‌ पापों का क्षय हो जाता है तो श्रद्धा और विधि से करनेवाले का फिर कहना ही क्या है? ऐसा मेरा मत है ॥ १७ ॥

इसके बाद मेरे को सुनने को कुछ भी शेष नहीं रहा है; क्योंकि अमृत से तृप्त मनुष्य दूसरे जल की इच्छा नहीं करता है ॥ १८ ॥

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