अध्याय ३१

सूतजी बोले – मुनिश्रेष्ठ विप्र नारदजी इस प्रकार कह कर चुप हो गये और प्राचीन मुनि नारायण के श्रेष्ठ चरणकमल को नमस्कार किये ॥ १९ ॥

जो प्राणी इस भारतवर्ष में जन्म को प्राप्त कर उत्तम श्रीपुरुषोत्तम मास का सेवन नहीं करते हैं, न श्रवण करते हैं, वे मनुष्य गृह में आसक्त रहने वाले मनुष्यों में अधम हैं ॥ २० ॥

इस संसार में जन्म और मरण को प्राप्त होते हैं और जन्म-जन्म में पुत्र, मित्र, स्त्री, श्रेष्ठ जन के वियोग से दुःख के भागी होते हैं ॥ २१ ॥

सूत उवाच ॥ इत्युक्त्वा विरतो विप्रो नारदो मुनिसत्तमः ॥ अनीनमत्पादपद्मं पुरातनमुनेः परम्‌ ॥ १९ ॥

भारते जनुरासाद्य पुरुषोत्तममुत्तमम्‌ ॥ न सेवन्ते न श्रृण्वन्ति गृहासक्ता नराधमाः ॥ २० ॥

गतागतं भजन्तेऽत्र दुर्भगा जन्मजन्मनि ॥ पुत्रमित्रकलत्राप्तवियोगाद्‌दुःखभागिनः ॥ २१ ॥

अस्मिन्मासे द्विजश्रेष्ठा नासच्छात्राण्युदाहरेत्‌ ॥ न स्वपेत परशय्यायां नालपेद्वितथं क्वचित्‌ ॥ २२ ॥

परापवादान्न ब्रूयान्न कथञ्चित्कदाचन ॥ परान्नं च न भुञ्जी्त न कुर्वीत परक्रियाम्‌ ॥ २३ ॥

वित्तशाठयमकुर्वाणो दानं दद्याद्‌द्विजातये ॥ विद्यमाने धने शाठयं कुर्वाणो रौरवं व्रजेत्‌ ॥ २४ ॥

हे द्विजश्रेष्ठ! इस पुरुषोत्तम मास में असत्‌ शास्त्रों को नहीं कहे, दूसरे की शय्या पर शयन नहीं करे, कभी असत्य बातचीत नहीं करे ॥ २२ ॥

कभी दूसरे की निन्दा नहीं करे, परान्न  को नहीं खाये और दूसरे की क्रिया को नहीं करे ॥ २३ ॥

शठता त्याग ब्राह्मण को दान देवे। धन रहने पर शठता करने वाला रौरव नरक को जाता है ॥ २४ ॥

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