अध्याय ३१

प्रतिदिन ब्राह्मण को भोजन देवे और व्रत करने वाला दिन के चार बजने पर भोजन करे ॥ २५ ॥

वे पुरुष धन्य हैं जो इस लोक में भक्ति और विधान से प्रेमपूर्वक पुरुषोत्तम भगवान्‌ का नित्य पूजन करते हैं ॥ २६ ॥

इन्द्रद्युम्न, शतद्युम्न, यौवनाश्व् और भगीरथ राजा पुरुषोत्तम का आराधन कर भगवान्‌ के समीप चले गये ॥ २७ ॥

दिने दिने द्विजेन्द्राय दत्त्वा भोजनमुत्तमम्‌ ॥ दिवसस्याष्टमे भागे व्रती भोजनमाचरेत्‌ ॥ २५ ॥

धन्यास्ते पुरुषा लोके ये नित्यं पुरुषोत्तमम्‌ ॥ अर्चयन्ति विधानेन भक्त्या प्रेमपुरःसरम्‌ ॥ २६ ॥

इन्द्रद्युम्नः शतद्युम्नो यौवनाश्वोु भगीरथः ॥ पुरुषोत्तममाराध्य ययुर्भगवदन्तिकम्‌ ॥ २७ ॥

तस्मात्सर्वप्रयत्नेयन संसेव्यः पुरुषोत्तमः ॥ सर्वसाधनतः श्रेष्ठः सर्वार्थफलदायकः ॥ २८ ॥

गोवर्धनधरं वन्दे गोपालं गोपरूपिणम्‌ ॥ गोकुलोत्सवमीशानं गोविन्दं गोपिकाप्रियम्‌ ॥ २९ ॥

कौण्डिन्येन पुराप्रोक्तमिमं मन्त्रं पुनः पुनः ॥ जपन्मासं नयेद्भक्त्या पुरुषोत्तममाप्नुयात्‌ ॥ ३० ॥

इसलिये समस्त साधनों से श्रेष्ठ, समस्त अर्थदायक पुरुषोत्तम भगवान्‌ का सब तरह से सेवन करना चाहिये ॥ २८ ॥

गोवर्धनधारी, गोपस्वरूप, गापाल, गोकुल के उत्सवस्वरूप, ईश्वहर, गोपिकाओं के प्रिय, गोविन्द भगवान्‌ को मैं नमस्कार करता हूँ ॥ २९ ॥

प्रथम कौण्डिन्य ऋषि ने इस मन्त्र को बार-बार कहा कि जो इस मन्त्र का भक्ति से जप करता हुआ पुरुषोत्तम मास को व्यतीत करता है वह पुरुषोत्तम भगवान्‌ को प्राप्त करता है ॥ ३० ॥

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