अध्याय ३१

नवीन मेघ के समान श्याम, दो भुजावाले, सुरलीधर, शोभमान, पीतवस्त्रधारी, सुन्दर, राधिका के सहित पुरुषोत्तम भगवान्‌ का ध्यान करे ॥ ३१ ॥

पुरुषोत्तम भगवान्‌ का ध्यान और पूजन करता हुआ पुरुषोत्तम मास को व्यतीत करे। इस प्रकार जो मनुष्य भक्ति से व्रत करता है वह अपने समस्त अभीष्ट को प्राप्त करता है ॥ ३२ ॥

हे तपोधन! यह गुप्त से भी गुप्त व्रत जिस किसी को नहीं कहना चाहिये। मैंने भी किसी के सामने नहीं कहा है ॥ ३३ ॥

ध्यायेन्नवघनश्यामं द्विभुजं मुरलीधरम्‌ ॥ लसत्पीतपटं रम्यं सराधं पुरुषोत्तमम्‌ ॥ ३१ ॥

ध्यायं ध्यायं नयेन्मासं पूजयन्पुरुषोत्तमम्‌ ॥ एवं यः कुरुते भक्त्या स्वाभीष्टं सर्वमाप्नुयात्‌ ॥ ३२ ॥

गुह्याद्‌गुह्यतरं चैतन्न वाच्यं यस्य कस्यचित्‌ ॥ मयाऽपि कथितं नैव कस्याऽप्यग्रे तपोधनाः ॥ ३३ ॥

श्रोतव्यमेतत्सततं पुराणमभीष्टदं पावनमादरेण ॥ श्लोसकैकमात्रश्रवणेन पुंसामघानि सर्वाणि निहन्ति विप्राः ॥ ३४ ॥

गङ्गादिसर्वतीर्थेषु मज्जतो यत्फलं भवेत्‌ ॥ तत्फलं श्रृण्वतस्तस्य माहात्म्यं मुनिसत्तमाः ॥ ३५ ॥

इलां प्रदक्षिणीकुर्वन्‌ यत्पुण्यं लभते नरः ॥ तत्पुण्यं श्रृण्वतस्तस्य माहात्म्यं पौरुषोत्तमम्‌ ॥ ३६ ॥

हे विप्रलोग! अभीष्ट फलदायक, पवित्र इस पुराण को आदरपूर्वक सर्वदा श्रवण करना चाहिये। एक श्लोाकमात्र के श्रवण से मनुष्यों के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं ॥ ३४ ॥

हे मुनिश्रेष्ठ! गंगादि समस्त तीर्थों में स्नान से जो फल मिलता है वह फल पुरुषोत्तम मास माहात्म्य के श्रवण से मिलता है ॥ ३५ ॥

मनुष्य पृथिवी की प्रदक्षिणा करता हुआ जिस पुण्य को प्राप्त करता है वह पुण्य पुरुषोत्तम मास माहात्म्य के श्रवण से होता है ॥ ३६ ॥

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