अध्याय ३१

ब्राह्मण ब्रह्मतेज वाला, क्षत्रिय पृथिवी का मालिक, वैश्य धन का मालिक होता है और शूद्र श्रेष्ठ हो जाता है ॥ ३७ ॥

और जो दूसरे पशुचर्या में तत्पर किरात, हूण आदि हैं वे सब पुरुषोत्तम के माहात्म्यश्रवण से मुक्ति को प्राप्त करते हैं ॥ ३८ ॥

जो पुरुषोत्तम मास के माहात्म्य को लिख कर और वस्त्र-आभूषण आदि से भूषित कर विधिपूर्वक ब्राह्मण को देता है ॥ ३९ ॥

ब्राह्मणो ब्रह्यवर्चस्वी क्षत्रियो वसुधाधिपः ॥ वैश्यो धनपतिर्भूयाच्छूद्रः सत्तमतां लभेत्‌ ॥ ३७ ॥

येऽन्ये किरातहूणाद्याः पशुचर्यापरायणाः ॥ ते सर्वे मुक्तिमायान्ति श्रुत्वा माहात्म्यमुत्तमम्‌ ॥ ३८ ॥

पुरुषोत्तममाहात्म्यं लेखयित्वा द्विजन्मने ॥ सम्भूष्य वस्त्रभूषाभिर्विधिना यः प्रयच्छति ॥ ३९ ॥

कुलत्रयं समुद्‌घृत्यगोलोकं याति दुर्लभम्‌ ॥ यत्रास्ते गोपिकावृन्दैर्वेष्टितः पुरुषोत्तमः ॥ ४० ॥

लिखित्वा धारयेद्यस्तु गृहे माहात्म्यमुत्तमम्‌ ॥ तद्‌गृहे सर्वतीर्थानि विलसन्ति निरन्तरम्‌ ॥ ४१ ॥

मासोत्तमस्य महिमानमनन्तपुण्यं श्रुत्वा सुविस्मितधियो मुनयश्चर सर्वे ॥ ऊचुश्चि सूततनयं विनयेन विष्वक्सेनाङ्घ्रिसेवनविधौ निपुणा नितान्तम्‌ ॥ ४२ ॥

वह तीनों कुलों का उद्धार करके जहाँ पर गोपिकाओं के समूह से घिरे हुए पुरुषोत्तम भगवान्‌ हैं ऐसे दुर्लभ गोलोक को जाता है ॥ ४० ॥

जो इस उत्तम माहात्म्य को लिखकर गृह में रखता है उसके गृह में समस्त तीर्थ निरन्तर विलास करते हैं ॥ ४१ ॥

अनन्त पुण्य को देने वाले महीनों में श्रेष्ठ पुरुषोत्तम मास के माहात्म्य को सुन समस्त मुनि लोग आश्चैर्य करने लगे और वे भगवान्‌ की चरण-सेवा में अत्यन्त निपुण मुनि लोग विनयपूर्वक सूतजी के पुत्र से बोले ॥ ४२ ॥

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