अध्याय ३१

ऋषि लोग बोले – हे सूत! हे सूत! हे महाभाग! हे महामते! तुम धन्य हो। तुम्हारे मुख से अमृत पान कर हम सब अत्यन्त कृतार्थ हो गये ॥ ४३ ॥

हे सूत! हे पौराणिकों में शिरोमणि! तुम सदा चिरंजीवी होवो और तुम्हारी कीर्ति निरन्तर जगत्‌ में पवित्रों को भी पवित्र करने वाली हो ॥ ४४ ॥

ऋषय ऊचुः ॥ सूत सूत महाभाग धन्योऽसि त्वं महामते ॥ त्वन्मुखामृतपानेन कृतार्थाः स्मो वयं भृशम्‌ ॥ ४३ ॥

चिरञ्जीव सदा सूत पौराणिकशिरोमणे ॥ अस्तु ते शाश्वती कीर्तिर्जगत्पावनपावनी ॥ ४४ ॥

तुभ्यं प्रदत्तं निमिषालयस्थैर्ब्रह्मासनं पूज्यतमं मुनीशैः ॥ त्वदायवक्त्राम्बुजनिर्गत श्रीमुकुन्दवार्तामृतपानलोलैः ॥ ४५ ॥

विष्टरश्रवस एव पवित्रा यावदेव वितता भुवि कीर्तिः ॥ तावदत्र मुनिवर्यसमाजे श्रीहरेर्वद कथां कमनीयाम्‌ ॥ ४६ ॥

तुम्हारे मुखकमल से निकले हुए श्रीमुकुन्द के कथामृत के पान में लोल नैमिषारण्य में स्थित, मुनीन्द्रों द्वारा आपके लिए अत्यन्त पूज्य ब्रह्मा का आसन दिया गया ॥ ४५ ॥

जब तक विष्णु भगवान्‌ की कीर्ति पृथिवी पर रहे तब तक इस पृथिवी पर मुनियों के समाज में हरि भगवान्‌ की सुन्दर कथा को आप कहते रहें ॥ ४६ ॥

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