अध्याय ४

श्रीनारायण बोले – हे नारद! भगवान् पुरुषोत्तम के आगे जो शुभ वचन अधिमास ने कहे वह लोगों के कल्याण की इच्छा से हम कहते हैं, सुनो ॥ १ ॥

अधिमास बोला – हे नाथ! हे कृपानिधे! हे हरे! मेरे से जो बलवान् हैं उन्होंने ‘यह मलमास है’ ऐसा कहकर मुझ दीन को अपनी श्रेणी से निकाल दिया है ऐसे यहाँ आये हुए मेरी आप रक्षा क्यों नहीं करते? ॥ २ ॥

अपने स्वामी देवता वाले मासादिकों द्वारा शुभ कर्म में वर्जित मुझ स्वामिरहित को देखते ही आपकी दयालुता कहाँ चली गयी और आज यह कठोरता कैसे आ गयी? ॥ ३ ॥

श्रीनारायण उवाच ॥ श्रृणु नारद वक्ष्येऽहं लोकानां हितकाम्यया ॥ अधिमासेन यत्प्रोक्‍तं हरेरग्रे शुभं वचः ॥ १ ॥

अधिमास उवाच ॥ अयि नाथ कृपानिधे हरे न कथं रक्षसि मामिहागतम्‌ ॥ कृपणं प्रबलैर्निकृतं मलमासेत्यभिधां विधाय मे ॥ २ ॥

शुभकर्मणि वर्जितंहि मां निरधीशं मलिनं सदैवतैः ॥ अवलोकयतो दयालुता क्क गता तेऽद्य कठोरता कथम्‌ ॥ ३ ॥

वसुदेववराड्गना यथा खलकंसानलतः सुरक्षिता ॥ वद मां शरणागतं कथं न तथाद्यावसि दीनवत्सल ॥ ४ ॥

द्रुपदस्य सुता यथा खलदुःशासनदुःखतोऽविता ॥ वद मां शरणागतं कथं न तथाद्यावसि दीनवत्सल ॥ ५ ॥

यमुनाविषतो यादवोऽविताः पशुपालाः पशवो यथा त्वया ॥ वद मां शरणागतं कथं न तथाद्यावसि दीनवत्सल ॥ ६ ॥

हे भगवन्! कंसरूप अग्नि से जलती हुई वसुदेव की स्त्री (देवकी) की रक्षा जैसे आपने की वैसे ही हे दीनवत्सल! कहिये मुझ शरण आये की आज कैसे रक्षा नहीं करते? ॥ ४ ॥

पहिले द्रुपद राजा की कन्या द्रौपदी की दुःशासन के दुःख से जैसे आपने रशा की वैसे हे दीनदयाला! कहिये मुझ शरण आये की आज कैसे रक्षा नहीं करते? ॥ ५ ॥

यमुना में कालिय नाग के विष से गौ चरानेवालों तथा पशुओं की आपने जैसे रक्षा की वैसे हे दीनवत्सल! कहिये मुझ शरण आये की आज कैसे रक्षा नहीं करते? ॥ ६ ॥

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