अध्याय ४

पशु और पशुओं को पालने वालों एवं पशुपालकों की स्त्रियों की जैसे पहिले व्रज में सर्पतके वन में लगी हुई अग्नि से आपने रक्षा की वैसे हे दीनवत्सल! कहिये मुझ शरण आये की आज कैसे रक्षा नहीं करते ॥ ७ ॥

मगध देश के राजा जरासंध के बन्धन से राजाओं की जैसे रक्षा की वैसे हे दीनवत्सल! कहिये मुझ शरण आये की आप कैसे रक्षा नहीं करते ॥ ८ ॥

आपने ग्राह के मुख से गजराज की झट आकर जैसे रक्षा की वैसे हे दीनवत्सल! कहिये मुझ शरण आये की आज कैसे रक्षा नहीं करते ॥ ९ ॥

पशवः पशुपास्तदङ्गना अविता दावधनञ्जयाद्यथा ॥ वद मां शरणागतं कथं न तथाद्यावसि दीनवत्सल ॥ ७ ॥

पृथिवीपतयो यथाविता मगधेशालयबन्धनात्त्वया ॥ वद मां शरणागतं कथं न तथाद्यावसि दीनवत्सल ॥ ८ ॥

गजनायक एत्य रक्षितो झटिति ग्राहमुखाद्यथा त्वया ॥ वद मां शरणागतं कथं न तथाद्यावसि दीनवत्सल ॥ ९ ॥

श्रीनारायण उवाच ॥ इति विज्ञाप्य भूमानं विरराम निरीश्वरः ॥ मलमासोऽश्रु वदनस्तिष्ठन्नग्रे जगत्पतेः ॥ १० ॥

तदानीं श्रीहरिस्तूर्णं कृपयाप्लावितो भृशम्‌ ॥ उवाच दीनवदनं मलमासं पुरःस्थितम्‌ ॥ ११ ॥

श्रीहरिरुवाच ॥ वत्स वत्स किमत्यन्तं दुःखमग्नोऽसि साम्प्रतम्‌ ॥ एतादृशं महत्‌ दुःखं किं ते मनसि वर्तते ॥ १२ ॥

श्रीनारायण बोले – इस प्रकार भगवान्‌ को कह स्वामीरहित मलमास, आँसू बहता मुख लिये जगत्पति के सामने चुपचाप खड़ा रहा ॥ १० ॥

उसको रोते देखते ही भगवान् शीघ्र ही दयार्द्र हो गये और पास में खड़े दीनमुख मलमास से बोले ॥ ११ ॥

श्रीहरि बोले – हे वत्स! क्यों इस समय अत्यन्त दुःख में डूबे हुए हो ऐसा कौन बड़ा भारी दुःख तुम्हारे मन में है? ॥ १२ ॥

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