अध्याय ४

दुःख में डूबते हुए तुझको हम बचावेंगे, तुम शोक मत करो। मेरी शरण में आया फिर शोक करने के योग्य नहीं रहता है ॥ १३ ॥

यहाँ आकर महादुःखी नीच भी शोक नहीं करता किसलिये तुम यहाँ आकर शोक में मन को दबाये हुए हो ॥ १४ ॥

जहाँ आने से न शोक होता है, न कभी बुढ़ौती आती है, न मृत्यु का भय रहता है, किन्तु नित्य आनन्द रहा करता है इस प्रकार के बैकुण्ठ में आकर तुम कैसे दुःखित हो? ॥ १५ ॥

त्वामहं दुःखसंमग्नमुद्धरिष्यामि मा शुचः ॥ न मे शरणमापन्नः पुनः शोचितुमर्हति ॥ १३ ॥

इहागत्य महादुःखी पतितोऽपि न शोचति ॥ किमर्थं त्वमिहागत्य शोकसंमग्नमानसः ॥ १४ ॥

अशोकमजरं नित्यं सानन्दं मृत्युवर्जितम्‌ ॥ वैकुण्ठमीदृशं प्राप्य कथं दुःखान्वितो भवान्‌ ॥ १५ ॥

त्वामत्र दुःखितं दृष्ट्वा वैकुण्ठस्थाः सुविस्मिताः ॥ किमर्थं मर्तुकामोऽसि तन्मे वत्स वदाधुना ॥ १६ ॥

श्रीनारायण उवाच ॥ श्रुत्वेदं भगवद्वाक्‍यं विभार इव भारभृत्‌ ॥ श्वासोच्छ्वावाससमायुक्त उवाच मधुसूदनम्‌ ॥ १७ ॥

तुमको यहाँ पर दुःखित देखकर वैकुण्ठवासी बड़े विस्मय को प्राप्त हो रहे हैं, हे वत्स! तुम कहो इस समय तुम मरने की क्यों इच्छा करते हो? ॥ १६ ॥

श्रीनारायण बोले – इस प्रकार भगवान् के वाक्य सुनकर बोझा लिये हुए आदमी जैसे बोझा रख कर श्‍वास पर श्‍वास लेता है इसी प्रकार श्‍वासोच्छ्‌वास लेकर – अधिमास मधुसूदन से बोला ॥ १७ ॥

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