अध्याय ४

अधिमास बोला – हे भगवन्! आप सर्वव्यापी हैं, आप से अज्ञात कुछ नहीं है, आकाश की तरह आप विश्‍व में व्याप्त होकर बैठे हैं ॥ १८ ॥

चर-अचर में व्याप्त विष्णु आप सब के साक्षी हैं, विश्‍व भर को देखते हैं, विषय की सन्निधि ने भी विकार शून्य आप में शास्त्रमर्यादा के अनुसार सब भूत ॥ १९ ॥

स्थित हैं हे जगन्नाथ! आप के बिना कुछ भी नहीं है। क्या आप मुझ अभागे के कष्ट को नहीं जानते हैं? ॥ २० ॥

अधिमास उवाच ॥ अज्ञातं तब नैवास्ति किञ्चिदप्यत्र संसृति ॥ आकाश इव सर्वत्र विश्‍वं व्याप्य व्यवस्थितः ॥ १८ ॥

चराचरगतो विष्णुः साक्षी सर्वस्य विश्वदृक्‌ ॥ कूटस्थे त्वयि सर्वाणि भूतानि च व्यवस्थया ॥ १९ ॥

संस्थितानी जगन्नाथ न किञ्चिद्भवता विना ॥ किन्न जानासि भगवन्निर्भाग्यस्य मम व्यथाम्‌ ॥ २० ॥

तथापि वच्मि हे नाथ दुःखजालमपावृतम्‌ ॥ तादृशं नैव कस्यापि न श्रुतं नावलोकितम्‌ ॥ २१ ॥

क्षणा लवा मुहूर्ताश्च पक्षा मासा दिवानिशम्‌ ॥ स्वामिनामधिकारैस्ते मोदन्ते निर्भयाः सदा ॥ २२ ॥

तथापि हे नाथ! मैं अपनी व्यथा को कहता हूँ जिस प्रकार मैं दुःखजाल से घिरा हुआ हूँ वैसे दुःखित को मैंने न कहीं देखा है और न सुना है ॥ २१ ॥

क्षण, निमेष, मुहूर्त, पक्ष, मास, दिन और रात सब अपने-अपने स्वामियों के अधिकारों से सर्वदा बिना भय के प्रसन्न रहते हैं ॥ २२ ॥

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