अध्याय ४

मेरा न कुछ नाम है, न मेरा कोई अधिपति है और न कोई मुझको आश्रय है अतः क्षणादिक समस्त स्वामी वाले देवों ने शुभ कार्य से मेरा निरादर किया है ॥ २३ ॥

यह मलमास सर्वदा त्याज्य है, अन्धा है, गर्त में गिरने वाला है ऐसा सब कहते हैं। इसी के कारण से मैं मरने की इ्च्छा करता हूँ अब जीने की इ्च्छा नहीं है ॥ २४ ॥

निन्द्य जीवन से तो मरना ही उत्तम है। जो सदा जला करता है वह किस तरह सो सकता है, हे महाराज! इससे अधिक मुझको और कुछ कहना नहीं है ॥ २५ ॥

न मे नाम न मे स्वामी न हि कश्चिन्ममाश्रयः ॥ तस्मान्निराकृतः सर्वैः साधिदेवैः सकर्मणः ॥ २३ ॥

निषिद्धो मलमासोऽयमित्यन्धोऽवटगः सदा ॥ तस्माद्विनष्‍टुमिच्छामि नाहं जीवितुमुत्सहे ॥ २४ ॥

कुजीविताद्वरं मृत्युर्नित्यदग्धः कथं स्वपेत्‌ ॥ अतः तरं महाराज वक्तव्यं नावशिष्यते ॥ २५ ॥

परदुःखासहिष्णुस्त्वमुपकारप्रियो मतः ॥ वेदेषु च पुराणेषु प्रसिद्धः पुरुषोत्तमः ॥ २६ ॥

निजधर्मं समालोच्य यथारुचि तथा कुरु ॥ पुनः पुनः पामरेण न वक्तव्यः प्रभुर्महान्‌ ॥ २७ ॥

मरिष्येऽहं मरिष्येऽहं मरिष्येऽहं पुनः पुनः ॥ इत्युक्‍त्वा मलमासोऽयं विरराम विधेः सुत ॥ २८ ॥

वेदों में आपकी इस तरह प्रसिद्धि है कि पुरुषोत्तम आप परोपकार प्रिय हैं और दूसरों के दुःख को सहन नहीं करते हैं ॥ २६ ॥

अब आप अपना धर्म समझकर जैसी इच्छा हो वैसा करें। आप प्रभु और महान् हैं, आपके सामने मुझ जैसे पामर को घड़ी-घड़ी कुछ कहते रहना उचित नहीं है ॥ २७ ॥

मैं मरूँगा, मैं मरूँगा, मैं अब न जीऊँगा, ऐसा पुनः पुनः कहकर वह अधिमास, हे ब्रह्मा के पुत्र! चुप हो गया ॥ २८ ॥

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