अध्याय ४

और एकाएक श्रीविष्णु के निकट गिर गया। तब इस प्रकार गिरते हुए मलमास को देख भगवान् की सभा के लोग बड़े विस्मय को प्राप्त हुए ॥ २९ ॥

श्रीनारायण बोले – इस प्रकार कहकर चुप हुए अधिमास के प्रति बहुत कृपा-भार से अवसन्न हुए श्रीकृष्ण, मेघ के समान गम्भीर वाणी से चन्द्रमा की किरणों की तरह उसे शान्त करते हुए बोले ॥ ३० ॥

ततः पपात सहसा सन्निधौ श्रीरमापते ॥ तत्र तं पतितं दृष्ट्वा संसज्जाता सुविस्मिता ॥ २९ ॥

श्रीनारायण उवाच ॥ इत्युक्‍त्वा विरतिमुपागतेऽधिमासे श्रीकृष्णो बहुलकृपाभरावसन्नः ॥ प्रावोचज्जलदगभीररावरम्य निर्वाणं शिशिरमयूखवन्नयंस्तम्‌ ॥ ३० ॥

सूत उवाच ॥ नारायणस्य निगमर्द्धिपरायणस्य पापौघवार्धिवडवाग्निवचोऽवदातम्‌ ॥ श्रुत्वा प्रहर्षितमना मुनिराबभाषे शुश्रूषुरादिपुरुषस्य वचांसि विप्राः ॥ ३१ ॥

इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पुरुषोत्तममासमाहात्म्ये मलमासविज्ञप्तिर्नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥

सूतजी बोले – हे विप्रो! वेदरूप ऋद्धि के आश्रित नारायण का पापों के समूहरूप समुद्र को शोषण करने वाला बड़वानल अग्नि से समान वचन सुनकर प्रसन्न हुए नारदमुनि, पुनः आदिपुरुष के वचनों को सुनने की इच्छा से बोले ॥ ३१ ॥

इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पुरुषोत्तममासमाहात्म्ये चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥

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