अध्याय ५

नारद जी बोले – हे महाभाग! हे तपोनिधे! इस प्रकार अधिमास के वचनों को सुनकर हरि ने चरणों के आगे पड़े हुए अधिमास से क्या कहा? ॥ १ ॥

श्रीनारायण बोले – हे पापरहित! हे नारद! जो हरि ने मलमास के प्रति कहा वह हम कहते हैं सुनो! हे मुनिश्रेष्ठ! आप जो सत्कथा हमसे पूछते हैं आप धन्य हैं ॥ २ ॥

नारद उवाच ॥ किमुवाच महाभाग श्रुत्वा तद्वचनं हरिः ॥ चरणाग्रे निपतितमधि मासं तपोनिधे ॥ १ ॥

श्रीनारायण उवाच ॥ श्रृणु नारद वक्ष्यामि यदुक्तं हरिणाऽनघ ॥ धन्योऽसि त्वं मुनिश्रेष्ठ यन्मां पृच्छसि सत्कथाम्‌ ॥ २ ॥

श्रीकृष्ण उवाच ॥ श्रृणु तत्रत्यवृत्तान्तं प्रवक्ष्यामि तवाग्रतः ॥ नेत्रकोणसमादिष्टस्तदानीं हरिणाऽर्जुन ॥ ३ ॥

बीजयामास पक्षेण तं मासं मूर्च्छितं खगः ॥ उत्थितः पुनरेवाह नैतन्मे रोचते विभो ॥ ४ ॥

अधिमास उवाच ॥ पाहि पाहि जगद्धातः पाहि विष्णो जगत्पते ॥ उपेक्षसे कथं नाथ शरणं मामुपागतम्‌ ॥ ५ ॥

श्रीकृष्ण बोले – हे अर्जुन! बैकुण्ठ का वृत्तान्त हम तुम्हारे सम्मुख कहते हैं, सुनो! मलमास के मूर्छित हो जाने पर हरि के नेत्र से संकेत पाये हुए गरुड़ मूर्छित मलमास को पंख से हवा करने लगे। हवा लगने पर अधिमास उठ कर फिर बोला हे विभो! यह मुझको नहीं रुचता है ॥ ३-४ ॥

अधिमास बोला – हे जगत्‌ को उत्पन्न करने वाले! हे विष्णो! हे जगत्पते! मेरी रक्षा करो! रक्षा करो! हे नाथ! मुझ शरण आये की आज कैसे उपेक्षा कर रहे हैं ॥ ५ ॥

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