अध्याय ५

इस प्रकार कहकर काँपते हुए घड़ी-घड़ी विलाप करते हुए अधिमास से, बैकुण्ठ में रहने वाले हृषीकेश हरि, बोले ॥ ६ ॥

श्रीविष्णु बोले – उठो-उठो तुम्हारा कल्याण हो, हे वत्स! विषाद मत करो। हे निरीश्वरर! तुम्हारा दुःख मुझको दूर होता नहीं ज्ञात होता है ॥ ७ ॥

ऐसा कहकर प्रभु मन में सोचकर क्षणभर में उपाय निश्च य करके पुनः अधिमास से मधुसूदन बोले ॥ ८ ॥

इत्युक्त्वार वेपमानं तं विलपन्त मुहुमुर्हुः ॥ तमुवाच हृषीकेशो वैकुण्ठनिलयो हरिः ॥ ६ ॥

श्रीविष्णुरुवाच ॥ उत्तिष्ठोत्तिष्ठ भद्रंते विषादं वत्स मा कुरु ॥ त्वद्‌दुःखं दुर्निवार्यं मे प्रतिभाति निरीश्व र ॥ ७ ॥

इत्युक्त्वाु मनसि ध्यात्वा तदुपायं क्षणं प्रभुः ॥ विनिश्चित्य पुनर्वाक्यदमुवाच मधुसूदनः ॥ ८ ॥

श्रीविष्णुरुवाच ॥ वत्सागच्छ मया सार्धं गोलोकं योगिदुर्लभम्‌ ॥ यत्रास्ते भगवान्‌ कृष्णः पुरुषोत्तम ईश्वरः ॥ ९ ॥

गोपिकावृन्दमध्यस्थो द्विभुजो मुरलीधरः ॥ नवीननीरदश्यामो रक्तपङ्कजलोचनः ॥ १० ॥

शरत्पूर्णेन्दु्सौन्दर्यसमशोभायुताननः ॥ कोटिकन्दर्पलावण्यलीलाधाममनोहरः ॥ ११ ॥

श्रीविष्णु बोले – हे वत्स! योगियों को भी जो दुर्लभ गोलोक है वहाँ मेरे साथ चलो जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण पुरुषोत्तम, ईश्व्र रहते हैं ॥ ९ ॥

गोपियों के समुदाय के मध्य में स्थित, दो भुजा वाले, मुरली को धारण किए हुए नवीन मेघ के समान श्याम, लाल कमल के सदृश नेत्र वाले ॥ १० ॥

शरत्पूर्णिमा के चन्द्रमा के समान अति सुन्दर मुख वाले, करोड़ों कामदेव के लावण्य की मनोहर लीला के धाम ॥ ११ ॥

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