अध्याय ५

पीताम्बर धारण किये हुए, माला पहिने, वनमाला से विभूषित, उत्तम रत्ना भरण धारण किये हुए, प्रेम के भूषण, भक्तों के ऊपर दया करने वाले ॥ १२ ॥

चन्दन चर्चित सर्वांग, कस्तूरी और केशर से युक्त, वक्षस्थल में श्रीवत्स चिन्ह से शोभित, कौस्तुक मणि से विराजित ॥ १३ ॥

श्रेष्ठ से श्रेष्ठ रत्नोंस के सार से रचित किरीट वाले, कुण्डलों से प्रकाशमान, रत्नोंल के सिंहासन पर बैठे हुए, पार्षदों से घिरे हुए जो हैं ॥ १४ ॥

पीताम्बरधरः स्रग्वी वनमालाविभूषितः ॥ सद्रत्न भूषणः प्रेमभूषणो भक्तवत्सलः ॥ १२ ॥

चन्दनोक्षितसर्वाङ्गः कस्तूरीकुंकुमान्वितः ॥ श्रीवत्सवक्षाः संभ्राजत्कौ्स्तुभेन विराजितः ॥ १३ ॥

सद्रत्न्साररचितकिरीटी कुण्डलोज्ज्वलः ॥ रत्न सिंहासनारूढः पार्षदैः परिवेष्टितः ॥ १४ ॥

स एव परमं ब्रह्म पुराणपुरुषोत्तमः ॥ स्वेच्छामयः सर्वबीजं सर्वाधारः परात्परः ॥ १५ ॥

निरीहो निर्विकारश्च परिपूर्णतमः प्रभुः ॥ प्रकृतेः पर ईशानो निर्गुणो नित्यविग्रहः ॥ १६॥

गच्छावस्तत्र त्वद्‌दुखं श्रीकृष्णो् व्यपनेष्यनति ॥ श्रीनारायण उवाच ॥ इत्युक्त्वा तं करे कृत्वा गोलोकं गतवान्‌ हरिः ॥ १७ ॥

वही पुराण पुरुषोत्तम परब्रह्म हैं। वे सर्वतन्त्रर स्वतन्त्रउ हैं, ब्रह्माण्ड के बीज, सबके आधार, परे से भी परे ॥ १५ ॥

निस्पृह, निर्विकार, परिपूर्णतम, प्रभु, माया से परे, सर्वशक्तिसम्पन्न, गुणरहित, नित्यशरीरी ॥ १६ ॥

ऐसे प्रभु जिस गोलोक में रहते हैं वहाँ हम दोनों चलते हैं वहाँ श्रीकृष्णचन्द्र तुम्हारा दुःख दूर करेंगे। श्रीनारायण बोले – ऐसा कहकर अधिमास का हाथ पकड़ कर हरि, गोलोक को गये ॥ १७ ॥

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