अध्याय ५

हे मुने! जहाँ पहले के प्रलय के समय में वे अज्ञानरूप महा अन्धकार को दूर करने वाले, ज्ञानरूप मार्ग को दिखाने वाले केवल ज्योतिः स्वरूप थे ॥ १८ ॥

जो ज्योति करोड़ों सूर्यों के समान प्रभा वाली, नित्य, असंख्य और विश्वप की कारण थी तथा उन स्वेच्छामय विभुकी ही वह अतिरेक की चरम सीमा को प्राप्त थी ॥ १९ ॥

जिस ज्योति के अन्दर ही मनोहर तीन लोक विराजित हैं। हे मुने! उसके ऊपर अविनाशी ब्रह्म की तरह गोलोक विराजित है ॥ २० ॥

अज्ञानान्धतमोध्वंसं ज्ञानवर्त्मप्रदीपकम्‌ ॥ ज्योतिःस्वरूपं प्रलये पुरासीत्के्वलं मुने ॥ १८ ॥

सूर्यकोटिनिभं नित्यमसंख्यं विश्वकारणम्‌ ॥ विभोः स्वेच्छामयस्यैव तज्ज्योतिरुल्बणं महत्‌ ॥ १९ ॥

ज्योतिरभ्यन्तरे लोकत्रयमेव मनोहरम्‌ ॥ तस्यैवोपरि गोलोकः शाश्व्तो ब्रह्मवन्मुने ॥ २० ॥

त्रिकोटियोजनायामो विस्तीर्णो मण्ड्लाकृतिः ॥ तेजःस्वरूपः सुमहद्रत्नभूमिमयः परः ॥ २१ ॥

अदृश्योि योगिभिः स्वप्ने दृश्यो गम्यश्च वैष्णवैः ॥ ईशेन विघृतो योगैरन्तःरिक्षस्थितो वरः ॥ २२ ॥

आधिव्याधिजरामृत्युशोकभीतिविवर्जितः ॥ सद्ररत्नभूषितासंख्यमन्दिरैः परिशोभितः ॥ २३ ॥

तीन करोड़ योजन का चैतर्फा जिसका विस्तार है और मण्डलाकार जिसकी आकृति है, लहलहाता हुआ साक्षात् मूर्तिमान तेज का स्वरूप है, जिसकी भूमि रत्नमय है ॥ २१ ॥

योगियों द्वारा स्वप्न में भी जो अदृश्य है, परन्तु जो विष्णु के भक्तों से गम्य और दृश्य है। ईश्वकर ने योग द्वारा जिसे धारण कर रखा है ऐसा उत्तम लोक अन्तरिक्ष में स्थित है ॥ २२ ॥

आधि, व्याधि, बुढ़ापा, मृत्यु, शोक, भय आदि से रहित है, श्रेष्ठ रत्नों से भूषित असंख्य मकार्नो से शोभित है ॥ २३ ॥

Pages: 1 2 3 4 5 6 7 8