अध्याय ५

उस गोलोक के नीचे पचास करोड़ योजन के विस्तार के भीतर दाहिने बैकुण्ठ और बाँयें उसी के समान मनोहर शिवलोक स्थित है ॥ २४ ॥

एक करोड़ योजन विस्तार के मण्डल का बैकुण्ठ, शोभित है, वहाँ सुन्दर पीताम्बरधारी वैष्णव रहते हैं ॥ २५ ॥

उस बैकुण्ठ के रहने वाले शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण किये हुए लक्ष्मी के सहित चतुर्भुज हैं। उस बैकुण्ठ में रहने वाली स्त्रियाँ, बजते हुए नूपुर और करधनी धारण की हैं, सब लक्ष्मी के समान रूपवती हैं ॥ २६ ॥

तदधा दक्षिणे वामे पञ्चाशत्कोटिविस्तरात्‌ ॥ वैकुण्ठः शिवलोकश्च तत्समः सुमनोहरः ॥ २४ ॥

कोटियोजनविस्तीर्णो वैकुण्ठो मण्डलाकृतिः ॥ लसत्पीतपटा रम्या यत्र तिष्ठन्ति वैष्णवाः ॥ २५ ॥

शङ्खचक्रगदापद्मश्रियाजुष्टचतुर्भुजाः स्त्रियो लक्ष्मीसमाः सर्वाः कूजन्नूपरमेखलाः ॥ २६ ॥

वामेन शिवलोकश्च कोटियोजनविस्तृतः ॥ लयशून्यश्च सृष्टौ च पार्षदैः परिवारितः ॥ २७ ॥

निवसन्ति महाभागा गणा यत्र कपर्दिनः ॥ भस्मोद्‌घूलितसर्वाङ्गा नागयज्ञोपवीतिनः ॥ २८ ॥

अर्धचन्द्रलसद्भालाः शूलपट्टिशपाणयः ॥ सर्वे गङ्गाधराः शूरास्त्र्यम्बका जयशालिनः ॥ २९ ॥

गोलोक के बाँयें तरफ जो शिवलोक है उसका करोड़ योजन विस्तार है और वह प्रलयशून्य है सृष्टि में पार्षदों से युक्त रहता है ॥ २७ ॥

बड़े भाग्यवान्‌ शंकर के गण जहाँ निवास करते हैं, शिवलोक में रहने वाले सब लोग सर्वांग भस्म धारण किये, नाग का यज्ञोपवीत पहिरे हुए ॥ २८ ॥

अर्धचन्द्र जिनके मस्तक में शोभित है, त्रिशूल और पट्टिशधारी, सब गंगा को धारण किये वीर हैं और सबके सब शंकर के समान जयशाली हैं ॥ २९ ॥

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