अध्याय ५

गोलोक के अन्दर अति सुन्दर एक ज्योति है। वह ज्योति परम आनन्द को देने वाली और बराबर परमानन्द का कारण है ॥ ३० ॥

योगी लोग बराबर योग द्वारा ज्ञानचक्षु से आनन्द जनक, निराकार और पर से भी पर उसी ज्योति का ध्यान करते हैं ॥ ३१ ॥

उस ज्योति के अन्दर अत्यन्त सुन्दर एक रूप है जो कि नीलकमल के पत्तों के समान श्याम, लाल कमल के समान नेत्र वाले ॥ ३२ ॥

गोलोकाभ्यन्तरे ज्योतिरतीव सुमनोहरम्‌ ॥ परमाह्लादकं शश्वत्परमानन्दकारणम्‌ ॥ ३० ॥

ध्यायन्ते योगिनः शश्वद्योगेन ज्ञानचक्षुषा ॥ तदेवानन्दजनकं निराकारं परात्परम्‌ ॥ ३१ ॥

तज्ज्योतिरन्तरे रूपमतीव सुमनोहरम्‌ ॥ इन्दीवरदलश्याामं पङ्कजारुणलोचनम्‌ ॥ ३२ ॥

कोटिशारदपूर्णेन्दुशश्वच्छोभायुता ननम्‌ ॥ कोटिमन्मथसौन्दर्य-लीलाधाम मनोहरम्‌ ॥ ३३ ॥

द्विभुजं मुरलीहस्तं सस्मितं पीतवाससम्‌ ॥ श्रीवत्सवक्षसंभ्राजत्कौस्तुभेन विराजितम्‌ ॥ ३४ ॥

करोड़ों शरत्पूर्णिमा के चन्द्र के समान शोभायमान मुखवाले, करोड़ों कामदेव के समान सौन्दर्य की, लीला का सुन्दर धाम ॥ ३३ ॥

दो भुजा वाले, मुरली हाथ में लिए, मन्दहास्य युक्त, पीताम्बर धारण किए, श्रीवत्स चिह्न से शोभित वक्षःस्थल वाले, कौस्तुभमणि से सुशोभित ॥ ३४ ॥

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