अध्याय ५

करोड़ों उत्तम रत्नोंु से जटित चमचमाते किरीट और कुण्डलों को धारण किये, रत्नर के सिंहासन पर विराजमान्‌, वनमाला से सुशोभित ॥ ३५ ॥

वही श्रीकृष्ण नाम वाले पूर्ण परब्रह्म हैं। अपनी इच्छा से ही संसार को नचाने वाले, सबके मूल कारण, सबके आधार, पर से भी परे ॥ ३६ ॥

छोटी अवस्था वाले, निरन्तर गोपवेष को धारण किये हुए, करोड़ों पूर्ण चन्द्रों की शोभा से संयुक्त, भक्तों के ऊपर दया करने वाले ॥ ३७ ॥

सद्रत्नेकोटिखचित-किरीटकटकोज्ज्वलम्‌ ॥ रत्न,सिंहासनस्थं च वनमालाविभूषितम्‌ ॥ ३५ ॥

तदेव परमं ब्रह्म पूर्णं श्रीकृष्णसंज्ञकम्‌ ॥ स्वेच्छामयं सर्वबीजं सर्वाधारं परात्परम्‌ ॥ ३६ ॥

किशोरवयसं शश्वद्गोपवेषविधायकम्‌ ॥ कोटिपूर्णेन्दुशोभाढ्यं भक्तनुग्रहकारकम्‌ ॥ ३७ ॥

निरीहं निर्विकारं च परिपूर्णतमं प्रभुम्‌ ॥ रासमण्डपमध्यस्थं शान्तं रासेश्वरं हरिम्‌ ॥ ३८ ॥

मङ्गलं मङ्गलार्हं च सर्वमङ्गलमङ्गलम्‌ ॥ परमानन्दराजं च सत्यमक्षरमव्ययम्‌ ॥ ३९ ॥

सर्वसिद्धेश्वरं सर्वसिद्धिरूपं च सिद्धिदम्‌ ॥ प्रकृतेः परमीशानं निर्गुणं नित्यविग्रहम्‌ ॥ ४० ॥

निःस्पृह, विकार रहित, परिपूर्णतम, स्वामी रासमण्डप के बीच में बैठे हुए, शान्त स्वरूप, रास के स्वामी ॥ ३८ ॥

मंगलस्वरूप, मंगल करने के योग्य, समस्त मंगलों के मंगल, परमानन्द के राजा, सत्यरूप, कभी भी नाश न होने वाले विकार रहित ॥ ३९ ॥

समस्त सिद्धों के स्वामी, सम्पूर्ण सिद्धि के स्वरूप, अशेष सिद्धियों के दाता, माया से रहित, ईश्वनर, गुणरहित, नित्यशरीरी ॥ ४० ॥

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