अध्याय ५

आदिपुरुष, अव्यक्त, अनेक हैं नाम जिनके, अनेकों द्वारा स्तुति किए जाने वाले, नित्य, स्वतन्त्र, अद्वितीय, शान्त स्वरूप, भक्तों को शान्ति देने में परायण ऐसे परमात्मा के स्वरूप को ॥ ४१ ॥

शान्तिप्रिय, शान्त और शान्ति परायण जो विष्णुभक्त हैं वे ध्यान करते हैं। इस प्रकार के स्वरूप वाले भगवान्‌ कहे जाने वाले, वही एक आनन्दकन्द श्रीकृष्णचन्द्र हैं ॥ ४२ ॥

श्रीनारायण बोले – ऐसा कहकर भगवान्, सत्त्व स्वरूप विष्णु अधिमास को साथ लेकर शीघ्र ही परब्रह्मयुक्त गोलोक में पहुंचे ॥ ४३ ॥

आद्यं पुरुषमव्यक्तंव पुरुहूतं पुरुष्टु तम्‌ ॥ नित्यं स्वतन्त्रमेकं च परमात्मस्वरूपकम्‌ ॥ ४१ ॥

ध्यायन्ते वैष्णवाः शान्ताः शान्तं शान्तिपरायणम्‌ ॥ एवं रूपं परं बिभ्रद्भगवानेक एव सः ॥ ४२ ॥

श्रीनारायण उवाच ॥ एवमुक्त्वा ततो विष्णुररधिमाससमन्वितः ॥ गोलोकमगमच्छीघ्रं विरजो वेष्टितं परम्‌ ॥ ४३ ॥

सूत उवाच ॥ इतीरयित्वा गिरमात्तसत्क्रिये मुनीश्वरे तूष्णीमवस्थिते मुनिः ॥ जगाद वाक्यं विधिजो महोत्सवाच्छुश्रूषुरानन्दनिधेर्नवाः कथाः ॥ ४४ ॥

इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे श्रीनारायणनारदसंवादे पुरुषोत्तममासमाहात्म्ये विष्णोर्गोलोकगमने पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥

सूतजी बोले – ऐसा कहकर सत्क्रिया को ग्रहण किये हुए नारायण मुनि के चुप हो जाने पर आनन्द सागर पुरुषोत्तम से विविध प्रकार की नयी कथाओं को सुनने की इच्छा रखने वाले नारद मुनि उत्कण्ठा पूर्वक बोले ॥ ४४ ॥

इति श्रीबृहन्नारदीय पुरुषोत्तममासमाहात्म्ये विष्णोर्गोलोकगमने पञ्चमोऽध्यायः समाप्तः ॥ ५ ॥

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