अध्याय ६

गोपियों के मण्डल के मध्य में रत्नमसिंहासन पर बैठे हुए कृष्ण को नमस्कार कर पास में खड़े होकर विष्णु बोले ॥ ७ ॥

श्रीविष्णु बोले – गुणों से अतीत, गोविन्द, अद्वितीय, अविनाशी, सूक्ष्म, विकार रहित, विग्रहवान, गोपों के वेष के विधायक ॥ ८ ॥

छोटी अवस्था वाले, शान्त स्वरूप, गोपियों के पति, बड़े सुन्दर, नूतन मेघ के समान श्याम, करोड़ों कामदेव के समान सुन्दर ॥ ९ ॥

गोपिकावृन्दमध्यस्थं रत्नसिंहासनासनम्‌ ॥ नत्वोवाच रमानाथो बद्धाञ्जलिपुटः पुरः ॥ ७ ॥

श्रीविष्णुरुवाच ॥ वन्दे विष्णुं गुणातीतं गोविन्दमेकमक्षरम्‌ ॥ अव्यक्तमव्ययं व्यक्तं गोपवेषविधायिनम्‌ ॥ ८ ॥

कोशोरवयसं शान्तं गोपीकान्तं मनोहरम्‌ ॥ नवीननीरदश्याोमं कोटिकन्दर्पसुन्दरम्‌ ॥ ९ ॥

वृन्दावनवनाभ्यन्ते रासमण्डलसंस्थितम्‌ ॥ लसत्पीतपटं सौम्यं त्रिभङ्गललिताकृतिम्‌ ॥ १० ॥

रासेश्वरं रासवासं रासोल्लाससमुत्सुकम्‌ ॥ द्विभुजं मुरलीहस्तं पीतवाससमच्युतम्‌ ॥ ११ ॥

इत्येवमुक्त्वाा तं नत्वा रत्नसिंहासने वरे ॥ पार्षदैः सत्कृमतो विष्णुः स उवास तदाज्ञया ॥ १२ ॥

वृन्दावन के अन्दर रासमण्डल में बैठने वाले पीतरंग के पीताम्बर से शोभित, सौम्य, भौंहों के चढ़ाने पर मस्तक में तीन रेखा पड़ने से सुन्दर आकृति वाले ॥ १० ॥

रासलीला के स्वामी, रासलीला में रहने वाले, रासलीला करने में सदा उत्सुक, दो भुजा वाले, मुरलीधर, पीतवस्त्रधारी, अच्युत ॥ ११ ॥

ऐसे भगवान् की मैं वन्दना करता हूँ। इस प्रकार स्तुति करके भगवान् श्रीकृष्ण को नमस्कार कर, पार्षदों द्वारा सत्कृत विष्णु रत्नतसिंहासन पर कृष्ण की आज्ञा से बैठे ॥ १२ ॥

Pages: 1 2 3 4 5 6