अध्याय ६

श्रीनारायण बोले – यह विष्णु का किया हुआ स्तोत्र प्रातःकाल उठ कर जो पढ़ता है उसके समस्त पाप नाश हो जाते हैं और अनिष्ट स्वप्न भी अच्छे फल को देते हैं ॥ १३ ॥

और पुत्रपौत्रादि को बढ़ाने वाली भक्ति श्रीगोविन्द में होती है, आकीर्ति का नाश होकर सत्कीर्ति की वृद्धि होती है ॥ १४ ॥

फिर भगवान् विष्णु बैठ गये और कृष्ण के आगे काँपते हुए अधिमास को कृष्ण के चरण कमलों में नमन कराते भये ॥ १५ ॥

श्रीनारायण उवाच ॥ इति विष्णुकृतं स्तोत्रं प्रातरुत्थाय यः पठेत्‌ ॥ पापानि तस्य नश्ययन्ति दुःस्वप्नः सत्फलप्रदः ॥ १३ ॥

भक्तिर्भवति गोविन्दे पुत्रपौत्रविवर्द्धिनी ॥ अकीर्तिः क्षयमाप्नोति सत्कीर्तिर्वर्द्धते चिरम्‌ ॥ १४ ॥

उपविष्टस्ततो विष्णुः श्रीकृष्णचरणाम्बुजे ॥ नामयामास तं मासं वेपमानं तदग्रतः ॥ १५ ॥

तदा पप्रच्छ श्रीकृष्णः कोऽयं कस्मादिहागतः ॥ कस्माद्रुदति गोलोके न कश्चिद्‌दुःखमश्नुनते ॥ १६ ॥

गोलोकवासिनः सर्वे सदाऽऽनन्दपरिप्लुताः ॥ स्वप्नेऽपि नैव श्रृण्वन्ति दुर्वार्तां च दुरन्वयाम्‌ ॥ १७ ॥

तस्मादयं कथं विष्णो मदग्रे दुःखितः स्थितः ॥ मुञ्चन्नश्रूणि नेत्राभ्यां वेपते च मुहुर्मुहुः ॥ १८ ॥

तब श्रीकृष्ण ने विष्णु से पूछा कि यह कौन है? कहाँ से यहाँ आया है? क्यों रोता है? इस गोलोक में तो कोई भी दुःखभागी होता नहीं है ॥ १६ ॥

इस गोलोक में रहने वाले तो सर्वदा आनन्द में मग्न रहते हैं। ये लोग तो स्वप्न में भी दुष्टवार्ता या दुःखभरा समाचार सुनते ही नहीं ॥ १७ ॥

अतः हे विष्णो! यह क्यों काँपता है और आँखों से आँसू बहाता दुःखित हमारे सम्मुख किस लिये खड़ा है? ॥ १८ ॥

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