अध्याय ६

श्रीनारायण बोले – नवीन मेघ के समान श्यामसुन्दर, गोलोक के नाथ का वचन सुन, सिंहासन से उठकर महाविष्णु मलमास की सम्पूर्ण दुःख-गाथा कहते हुए ॥ १९ ॥

श्रीविष्णु बोले – हे वृन्दावन की शोभा के नाथ! हे श्रीकृष्ण! हे मुरलीधर! इस अधिमास के दुःख को आपके सामने कहता हूँ, आप सुने ॥ २० ॥

इसके दुःखित होने के कारण ही स्वामी रहित अधिमास को लेकर मैं आपके पास आया हूँ, इसके उग्र दुःखरूप अग्नि को आप शान्त करें ॥ २१ ॥

श्रीनारायण उवाच ॥ नवाम्बुदानीकमनोहरस्य गोलोकनाथस्य वचो निशम्य ॥ उवाच विष्णुर्मलमासदुःखं प्रोत्थाय सिंहासनतः समग्रम्‌ ॥ १९ ॥

श्रीविष्णुरुवाच ॥ वृन्दावनकलानाथ श्रीकृष्ण मुरलीधर ॥ श्रूयतामधिमासीयं दुःखं वच्चि तवाग्रतः ॥ २० ॥

तस्मादहमिहायातो गृहीत्वामुं निरीश्वररम्‌ ॥ वानलं दुःखदातीव्रमेतदीयं निराकुरु ॥ २१ ॥

अयं त्वधिक्रमासोऽस्ति व्यपेतरविसंक्रमः ॥ मलिनोऽयमनर्होऽस्ति शुभकर्मणि सर्वदा ॥ २२ ॥

न स्नानं नैव दानं च कर्तव्यं प्रभुवर्जिते ॥ एवं तिरस्कृतः सर्वैर्वनस्पतिलतादिभिः ॥ २३ ॥

मासैर्द्वादशभिश्चैव कलाकाष्ठालवादिभिः ॥ अयनैर्हायनैश्चैव स्वामिगर्वसमन्वितैः ॥ २४ ॥

यह अधिमास सूर्य की संक्रान्ति से रहित है, मलिन है, शुभकर्म में सर्वदा वर्जित है ॥ २२ ॥

स्वामी रहित मास में स्नान आदि नहीं करना चाहिये, ऐसा कहकर वनस्पति आदिकों ने इसका निरादर किया है ॥ २३ ॥

द्वादश मास, कला, क्षण, अयन, संवत्सर आदि सेश्विरों ने अपने-अपने स्वामी के गर्व से इसका अत्यन्त निरादर किया ॥ २४ ॥

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