अध्याय ६

इसी दुःखाग्नि से जला हुआ यह मरने के लिये तैयार हुआ, तब अन्य दयालु व्यक्तियों द्वारा प्रेरित होकर ॥ २५ ॥

हे हृषीकेश! शरण चाहने की इच्छा से हमारे पास आया और काँपते-काँपते घड़ी-घड़ी रोते-रोते अपना सब दुःखजाल इसने कहा ॥ २६ ॥

इसका यह बड़ा भारी दुःख आपके बिना टल नहीं सकता, अतः इस निराश्रय का हाथ पकड़कर आपकी शरण में लाया हूँ ॥ २७ ॥

इति दुःखानलेनैव दग्धोऽयं मर्तुमुन्मुखः ॥ अन्यैर्दयालुभिः पश्चात्प्रेरितो मामुपागतः ॥ २५ ॥

शरणार्थो हृषीकेश वेपमानो रुदन्मुहुः ॥ सर्वं निवेदयामास दुःखजालमसंवृतम्‌ ॥ २६ ॥

एतदीयं महद्‌दुःखमनिवार्यं भवदृते ॥ अतस्त्वामाश्रितो नूनं करे कृत्वा निराश्रयम्‌ ॥ २७ ॥

परदुःखासहिष्णुस्त्वमिति वेदविदो जगुः ॥ अत एनं निरातङ्कं सानन्दं कृपया कुरु ॥ २८ ॥

त्वदीयचरणाम्भोजं गतो नैवावशोचते ॥ इति वेदविदो वाक्यं् भावि मिथ्या कथं प्रभो ॥ २९ ॥

मदर्थमपि कर्तव्यमेतद्‌दुःखनिवारणम्‌ ॥ सर्वं त्यक्त्वाकहमायातो यातं मे सफलं कुरु ॥ ३० ॥

‘दूसरों का दुःख आप सहन नहीं कर सकते हैं’ ऐसा वेद जानने वाले लोग कहते हैं। अतएव इस दुःखित को कृपा करके सुख प्रदान कीजिये ॥ २८ ॥

हे जगत्पते! ‘आपके चरणकमलों में प्राप्त प्राणी शोक का भागी नहीं होता है’ ऐसा वेद जाननेवालों का कहना कैसे मिथ्या हो सकता है? ॥ २९ ॥

मेरे ऊपर कृपा करके भी इसका दुःख दूर करना आपका कर्तव्य है क्योंकि सब काम छोड़कर इसको लेकर मैं आया हूँ मेरा आना सफल कीजिये ॥ ३० ॥

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