अध्याय ६

‘बारम्बार स्वामी के सामने कभी भी कोई विषय न कहना चाहिये’ ऐसी नीति के जानने वाले बड़े २ पण्डित सर्वदा कहा करते हैं ॥ ३१ ॥

इस प्रकार अधिमास का सब दुःख भगवान् कृष्ण से कहकर हरि, कृष्ण के मुखकमल की ओर देखते हुए कृष्ण के पास ही हाथ जोड़ कर खड़े हो गये ॥ ३२ ॥

ऋषि लोग बोले – हे सूतजी! आप दाताओं में श्रेष्ठ हैं आपकी दीर्घायु हो, जिससे हम लोग आपके मुख से भगवान् की लीला के कथारूप अमृत का पान करते रहें ॥ ३३ ॥

मुहुर्मुहुर्न वक्तव्यं कदापि प्रभुसन्निधौ ॥ वदन्त्येवं महाप्राज्ञा नित्यं नीतिविशारदाः ॥ ३१ ॥

इति विज्ञाप्य भूमानं बद्धाञ्जलिपुटो हरिः ॥ पुरस्तस्थौ भगवतो निरीक्षंस्तन्मुखाम्बुजम्‌ ॥ ३२ ॥

ऋषय ऊचुः ॥ सूत सूत वदान्योऽसि जीव त्वं शाश्वतीः समाः ॥ पिबामो यन्मुखात्सेव्यं हरिलीलाकथामृतम्‌ ॥ ३३ ॥

गोलोकवासिना सूत किमुक्तंय किं कृतं वद ॥ विष्णुश्रीकृष्णसंवादः सर्वलोकोपकारकः ॥ ३४ ॥

विधिसुतः किमपृच्छदृषीश्वरं तदधुना वद सूत तपस्विनः ॥ परमभागवतः स हरेस्तनुस्तदुदितं वचनं परमौषधम्‌ ॥ ३५ ॥

इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पुरुषोत्तममासमाहात्म्ये श्रीनारायणनारदसंवादे पुरुषोत्तमविज्ञप्तिर्नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥

हे सूत! गोलोकवासी भगवान् कृष्ण ने विष्णु के प्रति फिर क्या कहा? और क्या किया? इत्यादि लोकोपकारक विष्णु-कृष्ण का संवाद सब आप हम लोगों से कहिये ॥ ३४ ॥

परम भगवद्भक्त नारद ने नारायण से क्या पूछा? हे सूत! इसको आप इस समय हम लोगों से कहिये। नारद के प्रति कहा हुआ भगवान्‌ का वचन तपस्वियों के लिये परम औषध है ॥ ३५ ॥

इति श्रीबृहन्नारदीये पुरुषोत्तममासमाहात्म्ये षष्ठोऽध्यायः समाप्तः ॥ ६ ॥

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