अध्याय ७

सूतजी बोले – हे तपोधन! आप लोगों ने जो प्रश्नप किया है वही प्रश्न नारद ने नारायण से किया था सो नारायण ने जो उत्तर दिया वही हम आप लोगों से कहते हैं ॥ १ ॥

नारदजी बोले – विष्णु ने अधिमास का अपार दुःख निवेदन करके जब मौन धारण किया तब हे बदरीपते! पुरुषोत्तम ने क्या किया? सो इस समय आप हमसे कहिये ॥ २ ॥

सूत उवाच ॥ भवद्भिर्यः कृतः प्रश्न स्तमचीकरदाशुगः ॥ यदुत्तरमुवाचेशस्तद्वदामि तपोधनाः ॥ १ ॥

नारद उवाच ॥ विष्टरश्रवसि मौनमास्थिते सन्निवेद्य परदुःखमपारम्‌ ॥ किं चकार पुरुषोत्तमः परस्तद्वदस्व बदरीपतेऽधुना ॥ २ ॥

श्रीनारायण उवाच ॥ गोलोकनाथो यदुवाच विष्णुं तदेव गुह्यं कथयामि वत्स ॥ वाच्यं सुभक्ताय सदास्तिकाय शुश्रूषवे दम्भविवर्जिताय ॥ ३ ॥

सुकीर्तिकृत्‌ पुण्यकरं यशस्यं सत्पुत्रदं वश्यककरं च राज्ञाम्‌ ॥ दारिद्रदावाग्निरनल्पपुण्यः श्राव्यं तथा कार्यमनन्यभक्त्यास ॥ ४ ॥

श्रीनारायण बोले – हे वत्स! गोलोकनाथ श्रीकृष्ण ने विष्णु के प्रति जो कहा वह अत्यन्त गुप्त है परन्तु भक्त, आस्तिक, सेवक, दम्भरहित, अधिकारी पुरुष को कहना चाहिये। अतः मैं सब कहता हूँ सुनो ॥ ३ ॥

यह आख्यान सत्कीर्ति, पुण्य, यश, सुपुत्र का दाता, राजा को वश में करने वाला है और दरिद्रता को नाश करने वाला एवं बड़े पुण्यों से सुनने को मिलता है। जिस प्रकार इसको सुने उसी प्रकार अनन्य भक्ति से सुने हुए कर्मों को करना भी चाहिये ॥ ४ ॥

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