अध्याय ७

श्रीपुरुषोत्तम बोले – हे विष्णो! आपने बड़ा अच्छा किया जो मलमास को लेकर यहाँ आये। इससे आप लोक में कीर्ति पावेंगे ॥ ५ ॥

आपने जिसका उद्धार स्वीकार किया, उसको हमने ही स्वीकार किया, ऐसा समझें। अतः इसको हम अपने समान सर्वोपरि करेंगे ॥ ६ ॥

गुणों से, कीर्ति के अनुभाव से, षडैश्वयर्य से, पराक्रम से, भक्तों को वर देने से और भी जो मेरे गुण हैं, उनसे मैं पुरुषोत्तम जैसे लोक में प्रसिद्ध हूँ। वैसे ही यह मलमास भी लोकों में पुरुषोत्तम करके प्रसिद्ध होगा ॥ ७-८ ॥

श्रीपुरुषोत्तम उवाच ॥ समीचीनं कृतं विष्णो यदत्रागतवान्‌ भवान्‌ ॥ मलमासं करे कृत्वा लोके कीर्तिमवाप्स्यसि ॥ ५ ॥

यस्त्वयोरीकृतो जीवः स मयैवोररीकृतः ॥ अत एनं करिष्यामि सर्वोपरि यथा अहम्‌ ॥ ६ ॥

गुणैःकीर्त्याऽनुभावेन षड्‌भगैश्च पराक्रमैः ॥ भक्तानां वरदानेन गुणैरन्यैश्च मासकैः ॥ ७ ॥

अहमेतैर्यथालोके प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥ तथाऽयमपि लोकेषु प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥ ८ ॥

अस्मै समर्पिताः सर्वे ये गुणा मयि संस्थिताः ॥ पुरुषोत्तमेति यन्नाम प्रथितं लोकवेदयोः ॥ ९ ॥

तदप्यस्मै मया दत्तं तव तुष्ट्यै जनार्दन ॥ अहमेवास्य सञ्जोतः स्वामी च मधु्सूदन ॥ १० ॥

एतन्नाम्ना जगत्सर्वं पवित्रं च भविष्यसि ॥ मत्सादृश्यवमुपागम्य मासानामधिपो भवेत्‌ ॥ ११ ॥

मेरे में जितने गुण हैं वे सब आज से मैंने इसे दे दिये। पुरुषोत्तम जो मेरा नाम लोक तथा वेद में प्रसिद्ध है ॥ ९ ॥

वह भी आपकी प्रसन्नता का अर्थ आज मैंने इसे दे दिया। हे मधुसूदन! आज से मैं इस अधिमास का स्वामी भी हुआ ॥ १० ॥

इसके पुरुषोत्तम इस नाम से सब जगत् पवित्र होगा। मेरी समानता पाकर यह अधिमास सब मासों का राजा होगा ॥ ११ ॥

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