अध्याय ७

यह अधिमास जगत्पूज्य एवं जगत् से वन्दना करवाने के योग्य होगा। इसकी पूजा और व्रत जो करेंगे उनके दुःख और दारिद्रय का नाश होगा ॥ १२ ॥

चैत्रादि सब मास सकाम हैं इसको हमने निष्काम किया है। इसको हमने अपने समान समस्त प्राणियों को मोक्ष देने वाला बनाया है ॥ १३ ॥

जो प्राणी सकाम अथवा निष्काम होकर अधिमास का पूजन करेगा वह अपने सब कर्मों को भस्म कर निश्चय मुझको प्राप्त होगा ॥ १४ ॥

जगत्पूज्यो जगद्वन्द्यो मासोऽयं तु भविष्यति ॥ पूजकानां च सर्वेषां दुःखदारिद्रयखण्डनः ॥ १२ ॥

सर्वे मासाः सकामाश्च निष्कामोऽयं मया कृतः ॥ मोक्षदः सर्वलोकानां मत्तुल्योऽयं मया कृतः ॥ १३ ॥

अकामः सर्वकामो वा योऽधिमासं प्रपूजयेत्‌ ॥ कर्माणि भस्मसात्कृऽत्वा मामेवैष्यत्यसंशयम्‌ ॥ १४ ॥

यदर्थं च महाभागा यतिनो ब्रह्मचारिणः ॥ तपस्यन्ति महात्मानो निराहारा दृढव्रताः ॥ १५ ॥

फलपत्रानिलाहाराः कामक्रोधविवर्जिताः ॥ जितेन्द्रियाश्चःर सर्वे प्रोवृट्‌काले निराश्रयाः ॥ १६ ॥

शीतातपसहाश्चैरव यतन्ते गरुडध्वज ॥ तथापि नैव मे यान्ति परमं पदमव्ययम्‌ ॥ १७ ॥

जिस परम पद-प्राप्ति के लिये बड़े भाग्यवाले, यति, ब्रह्मचारी लोग तप करते हैं और महात्मा लोग निराहार व्रत करते हैं एवं दृढ़व्रत लोग फल, पत्ता, वायु-भक्षण कर रहते हैं और काम, क्रोध रहित जितेन्द्रिय रहते हैं वे, और वर्षाकाल में मैदान में रहने वाले, जाड़े में शीत, गरमी में धूप सहन करने वाले – मेरे पद के लिये यत्नद करते रहते हैं, हे गरुडध्वज! तब भी वे मेरे अव्यय परम पद को नहीं प्राप्त होते हैं ॥ १५-१६-१७ ॥

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