अध्याय ७

परन्तु पुरुषोत्तम के भक्त एक मास के ही व्रत से बिना परिश्रम जरा, मृत्यु रहित उस परम पद को पाते हैं ॥ १८ ॥

यह अधिमास व्रत सम्पूर्ण साधनों में श्रेष्ठ साधन है और समस्त कामनाओं के फल की सिद्धि को देने वाला है। अतः इस पुरुषोत्तम मास का व्रत सबको करना चाहिये ॥ १९ ॥

हल से खेत में बोये हुए बीज जैसे करोड़ों गुणा बढ़ते हैं तैसे मेरे पुरुषोत्तम मास में किया हुआ पुण्य करोड़ों गुणा अधिक होता है ॥ २० ॥

पुरुषोत्तमस्य भक्तास्तु मासमात्रेण तत्पदम्‌ ॥ अनायासेन गच्छन्ति जरामृत्युविवर्जितम्‌ ॥ १८ ॥

सर्वसाधनतः श्रेष्ठः सर्वकामार्थसिद्धिदः ॥ तस्मात्‌ संसेव्यतामेष मासोऽयं पुरुषोत्तमः ॥ १९ ॥

सीतानिक्षिप्तबीजानिवर्धन्ते कोटिशो यथा ॥ तथा कोटिगुणं पुण्यं कृतं मे पुरुषोत्तमे ॥ २० ॥

चातुर्मास्यादिभिर्यज्ञैः स्वर्गं गच्छन्ति केचन ॥ तत्रत्यं भोगमासाद्य पुनर्गच्छन्ति भूतलम्‌ ॥ २१ ॥

विधिवत्‌ सेवते यस्तु पुरुषोत्तममादरात्‌ ॥ कुलं स्वकीयमुद्‌घृत्य मामेवैष्यत्यसंशयम्‌ ॥ २२ ॥

मामुपेतोऽत्र संसारं जन्ममृत्यु भयाकुलम्‌ ॥ आधिव्याधिजराग्रस्तं न पुनर्याति मानवः ॥ २३ ॥

कोई चातुर्मास्यादि यज्ञ करने से स्वर्ग में जाते हैं, वह भी भोगों को भोगकर पृथ्वी पर आते हैं ॥ २१ ॥

परन्तु जो पुरुष आदर से विधिपूर्वक अधिमास का व्रत करता है वह अपने समस्त कुल का उद्धार कर मेरे में मिल जाता है इसमें संशय नहीं है ॥ २२ ॥

हमको प्राप्त होकर प्राणी पुनः जन्म, मृत्यु, भय से युक्त एवं आधि, व्याधि और जरा से ग्रस्त संसार में फिर नहीं आता ॥ २३ ॥

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