अध्याय ७

जहाँ जाकर फिर पतन नहीं होता सो मेरा परम धाम है, ऐसा जो वेदों का वचन है वह सत्य है, असत्य कैसे हो सकता है? ॥ २४ ॥

यह अधिमास और इसका स्वामी मैं ही हूँ और मैंने ही इसे बनाया है और ‘पुरुषोत्तम’ यह जो मेरा नाम है सो भी मैंने इसे दे दिया है ॥ २५ ॥

अतः इसके भक्तों की मुझे दिन-रात चिन्ता बनी रहती है। उसके भक्तों की मनःकामनाओं को मुझे ही पूर्ण करना पड़ता है ॥ २६ ॥

यद्‌गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥ इतिच्छन्दोवचः सत्यमसत्यं जायते कथम्‌ ॥ २४ ॥

एतन्मासाधिपश्चाहं मयैवायं प्रतिष्ठितः ॥ पुरुषोत्तमेति मन्नाम तदप्यस्मै समर्पितम्‌ ॥ २५ ॥

तस्मादेतस्य भक्तानां मम चिन्ता दिवानिशम्‌ ॥ तद्भक्तकामनाः सर्वाः पूरणीया मयैव हि ॥ २६ ॥

कदाचिन्मम भक्तानामपराधोऽधिगण्यते ॥ पुरुषोत्तमभक्तानां नापराधः कदाचन ॥ २७ ॥

मदाराधनतो विष्णो मदीयाराधनं प्रियम्‌ ॥ मद्भक्तकामनादाने विलम्बेऽहं कदाचन ॥ २८ ॥

मदीयमासभक्तानां न विलम्बे कदाचन ॥ मदीयमासभक्ता ये ते ममातीव वल्लभाः ॥ २९ ॥

कभी-कभी मेरे भक्तों का अपराध भी गणना में आ जाता है, परन्तु पुरुषोत्तम मास के भक्तों का अपराध मैं कभी नहीं गिनता ॥ २७ ॥

हे विष्णो! मेरी आराधना से मेरे भक्तों की आराधना करना मुझे प्रिय है। मेरे भक्तों की कामना पूर्ण करने में मुझे कभी देर भी हो जाती है ॥ २८ ॥

किन्तु मेरे मास के जो भक्त हैं उनकी कामना पूर्ण करने में मुझे कभी भी विलम्ब नहीं होता है। मेरे मास के जो भक्त हैं वे मेरे अत्यन्त प्रिय हैं ॥ २९ ॥

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