अध्याय ७

जो मनुष्य इस अधिमास में जप, दान नहीं करते वे महामूर्ख हैं और जो पुण्य कर्मरहित प्राणी स्नान भी नहीं करते एवं देवता, तीर्थ द्विजों से द्वेष करते हैं ॥ ३० ॥

वे दुष्ट अभागी और दूसरे के भाग्य से जीवन चलने वाले होते हैं। जिस प्रकार खरगोश के सींग कदापि नहीं होते वैसे ही अधिमास में स्नानादि न करने वालों को स्वप्न में भी सुख प्राप्त नहीं होता है ॥ ३१ ॥

जो मूर्ख मेरे प्रिय मलमास का निरादर करते हैं और मलमास में धर्माचरण नहीं करते वे सर्वदा नरकगामी होते हैं ॥ ३२ ॥

य एतस्मिन्महामूढ जपदानादिवर्जिताः ॥ सत्कर्मस्नानरहिता देवतीर्थद्विजद्विषः ॥ ३० ॥

जायन्ते दुर्भगा दुष्टाः परभाग्योपजीविनः ॥ न कदाचित्सुखं तेषां स्वप्नेऽपि शशश्रृङ्गवत्‌ ॥ ३१ ॥

तिरस्कुर्वन्ति ये मूढा मलमासं मम प्रियम्‌ ॥ नाचरिष्यन्ति ये धर्मं ते सदा निरयालयाः ॥ ३२ ॥

पुरुषोत्तममासाद्य वर्षे तृतीयके ॥ नाचरिष्यन्ति धर्मं ये कुम्भीपाके पतन्ति ते ॥ ३३ ॥

इह लोके महद्‌दुःखं पुत्रपौत्रकलत्रजम्‌ ॥ प्राप्नुवन्ति महामूढा दुःखदावानलस्थिताः ॥ ३४ ॥

ते कथं सुखमेधन्ते येषामज्ञानतो गतः ॥ श्रीमान्‌ पुण्यतमो मासो मदीयः पुरुषोत्तमः ॥ ३५ ॥

प्रति तीसरे वर्ष पुरुषोत्तम मास प्राप्त होने पर जो प्राणी धर्म नहीं करते वे कुम्भीपाक नरक में गिरते हैं ॥ ३३ ॥

और इस लोक में दुःख रूप अग्नि में बैठे स्त्री, पुत्र, पौत्र आदिकों से उत्पन्न बड़े भारी दुःखों को भोगते हैं ॥ ३४ ॥

जिन प्राणियों को यह मेरा पुण्यतम पुरुषोत्तम मास अज्ञान से व्यतीत हो जाय वे प्राणी कैसे सुखों को भोग सकते हैं? ॥ ३५ ॥

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