अध्याय ७

जो भाग्यशालिनी स्त्रियाँ सौभाग्य और पुत्र-सुख चाहने की इच्छा से अधिमास में स्नान, दान, पूजनादि करती हैं ॥ ३६ ॥

उन्हें सौभाग्य, सम्पूर्ण सम्पत्ति और पुत्रादि यह अधिमास देत है। जिनका यह मेरे नामवाला पुरुषोत्तम मास दानादि से रहित बीत जाता है ॥ ३७ ॥

उनके अनुकूल मैं नहीं रहता और न उन्हें पति-सुख प्राप्त होता है, भाई, पुत्र, धनों का सुख तो उसे स्वप्न में भी दुर्लभ है ॥ ३८ ॥

याः स्त्रियः सुभगाः पुत्रसुखसौभाग्यहेतवे ॥ पुरुषोत्तमे करिष्यन्ति स्नानदानार्चनादिकम्‌ ॥ ३६ ॥

तासां सौभाग्यसम्पत्तिसुखपुत्रप्रदो ह्यहम्‌ ॥ यासां मासो गतः शून्यो मन्नामा पुरुषोत्तमः ॥ ३७ ॥

न तासामनुकूलोऽहं न सुखं स्वामिजं भवेत्‌ ॥ भ्रातृपुत्रधनानां सुखं स्वप्नेऽपि दुर्लभम्‌ ॥ ३८ ॥

तस्मात्सर्वात्मना सर्वैः स्नानपूजाजपादिकम्‌ ॥ विशेषेण प्रकर्तव्यं दानं शक्त्योनुसारतः ॥ ३९ ॥

येनाऽहमर्चितो भक्त्या मासेऽस्मिन्‌ पुरुषोत्तमे ॥ धनपुत्रसुखं भुक्त्वार पञ्चाद्गोलोकवासभाक्‌ ॥ ४० ॥

अतः विशेष करके सब प्राणियों को अधिमास में स्नान, पूजा, जप आदि और विशेष करके शक्ति के अनुसार दान अवश्य कर्तव्य है ॥ ३९ ॥

जो मनुष्य इस पुरुषोत्तम मास में भक्तिपूर्वक मेरा पूजन करते हैं वे धन, पुत्र और अनेक सुखों को भोगकर पुनः गोलोक के वासी होते हैं ॥ ४० ॥

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