अध्याय ८

सूतजी बोले – हे तपोधन! विष्णु और श्रीकृष्ण के संवाद को सुन सन्तुष्टमन नारद, नारायण से पुनः प्रश्न करने लगे ॥ १ ॥

नारदजी बोले – हे प्रभो! जब विष्णु बैकुण्ठ चले गये तब फिर क्या हुआ? कहिये। आदिपुरुष कृष्ण और हरिसुत का जो संवाद है वह सब प्राणियों को कल्याणकर है ॥ २ ॥

इस प्रकार प्रश्न् सुन फिर भगवान् बदरीनारायण जगत् को आनन्द देने वाला बृहत् आख्यान कहने लगे ॥ ३ ॥

सूत उवाच ॥ नारदः कृतवान्‌ प्रश्नं पुनरेव तपोधनाः ॥ विष्णुश्री कृष्णसंवादं श्रुत्वा सन्तुष्टमानसः ॥ १ ॥

नारद उवाच ॥ वैकुण्ठं गतवति रुक्मिणीशे कि जातं तदनुवद प्रभो मे ॥ वृत्तान्तं हरिसुतकृष्णयोश्च सर्वेषां हितकरमादिपुंसोः ॥ २ ॥

इति संप्रश्न२संहृष्टो भगवान्‌ बदरीपतिः ॥ उवाच पुनरेवामुं जगदानन्ददं बृहत्‌ ॥ ३ ॥

श्रीनारायण उवाच ॥ अथ श्रीरुक्मिणीनाथो वैकुण्ठं गतवान्‌ मुदा ॥ तत्र गत्वाऽधिमासं तं वासयामास नारद ॥ ४ ॥

तत्रत्यवसतिं प्राप्य मोदमानोऽभवत्तदा ॥ मासानामधिपो भूत्वा रमते विष्णुना सह ॥ ५ ॥

द्वादशस्वपि मासेषु मलमासं वरं प्रभुः ॥ विधाय मनसा तुष्टो बभूव प्रकृतिप्रिपः ॥ ६ ॥

श्रीनारायण बोले – तदनन्तर विष्णु बड़े प्रसन्न होकर बैकुण्ठ गये और वहाँ जाकर हे नारद! अधिमास को अपने पास ही बसा लिया ॥ ४ ॥

अधिमास बैकुण्ठ में वास पाकर अत्यन्त प्रसन्न हुआ और बारहों मासों का राजा होकर विष्णु के साथ रहने लगा ॥ ५ ॥

बारहों मासों में मलमास को श्रेष्ठ बनाकर विष्णु मन से सन्तुष्ट हुए ॥ ६ ॥

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