अध्याय ८

दाह के अनन्तर कन्या को समझा कर सब ऋषि अपने-अपने आश्रम गये। इधर कन्या भी धैर्य धारण कर यथाशक्ति क्रिया के लिए द्रव्य खर्च करती हुई ॥ ५२ ॥

ततः कन्यां समाश्वाास्य सर्वे ते स्वगृहान्‌ ययुः ॥ कन्याऽपि धैर्यमालम्ब्य यथाशक्त्याकरोद्‌व्ययम्‌ ॥ ५२ ॥

इत्यौर्ध्वदेहिकविधिं प्रणिंधाय पित्र्यं पुत्री निवासमकरोच्च तपोवनेऽस्मिन्‌ ॥ सा विव्यथे पितृजदुःखदवाग्निदग्धा रम्भेव वत्समरणात्‌ सुरभीव बाला ॥५३ ॥

इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पुरुषोत्तममासमाहात्म्ये श्रीनारायणनारदसंवादे कुमारीविलापो नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥

इस प्रकार पिता की मरण-क्रिया को करके कन्या इसी तपोवन में निवास करने लगी और पिता के मरणरूप दुःखाग्नि से जली हुई रम्भा की तरह व्यथित होती हुई एवं बछड़े के मर जाने से जैसे गौ चिल्लाती है और खाती नहीं दुर्बल होती है वैसे ही यह बाला भी दुःखित हुई ॥ ५३ ॥

इति श्रीबृहन्नारदीये पुरुषोत्तममासमाहात्म्ये अष्टमोऽध्यायः समाप्तः ॥ ८ ॥

Pages: 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10