अध्याय ८

हे मुने! अनन्तर भक्तों के ऊपर कृपा करने वाले भगवान् युधिष्ठिर और द्रौपदी की ओर देखते हुए, कृपा करके अर्जुन से यह बोले ॥ ७ ॥

श्रीकृष्ण बोले – हे राजशार्दूल! हमको मालूम होता है कि तपोवन में आकर आप लोगों ने दुःखित होने के कारण पुरुषोत्तम मास का आदर नहीं किया ॥ ८ ॥

वृन्दावन की शोभा के नाथ भगवान् का प्रियपात्र पुरुषोत्तम मास आप वनवासियों का प्रमाद से व्यतीत हो गया ॥ ९ ॥

अथार्जुनमुवाचेदं भगवान्‌ भक्तवत्सलः ॥ युधिष्ठिरं च पाञ्चाली निरीक्षन्‌ कृपया मुने ॥ श्रीकृष्ण उवाच ॥ जानेऽहं राजशार्दूल तपोवनमुपागतैः ॥ भवद्भिर्दुःखसम्मग्नैर्नादृतः पुरुषोत्तमः ॥ ८ ॥

वृन्दावनकलानाथवल्लभः पुरुषोत्तमः ॥ प्रमादाद्गतवान्‌ मासो भवतां काननौकसाम्‌ ॥ ९ ॥

युष्माभिर्नैव विज्ञातो भयद्वेषसमन्वितैः ॥ गाङ्गेयद्रोणकर्णेभ्यो भयसन्त्रस्तमानसैः ॥ १० ॥

कृष्णद्वैपायनादाप्तविद्याराधनतत्परे ॥ इन्द्रकीलं गतवति बीभत्सौ रणशालिनि ॥ ११ ॥

तद्वियोगपरिक्लिष्टैर्न ज्ञातः पुरुषोत्तमः ॥ युष्माभिः किं प्रकर्तव्यमदृष्टमवलम्ब्यताम्‌ ॥ १२ ॥

भीष्म, द्रोणाचार्य, कर्ण के भय से सन्त्रस्त मन आप सब लोगों ने भय और द्वेष से मुक्त होने के कारण प्राप्त पुरुषोत्तम मास का ध्यान नहीं किया ॥ १० ॥

कृष्णद्वैपायन व्यासदेव से प्राप्त विद्या के आराधन में तत्पर, रणवीर अर्जुन के इन्द्रकील पर्वत पर चले जाने पर ॥ ११ ॥

उसके वियोग से दुःखित आप लोगों ने पुरुषोत्तम मास को नहीं जाना। अब यदि आप यह पूछें कि हम क्या करें? तो मैं यही कहूँगा कि भाग्य का अवलम्बन करो ॥ १२ ॥

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