अध्याय ८

पुरुषों का जैसा अदृष्ट होता है वैसा ही सदा भासता है। भाग्य से उत्पन्न जो फल है वह अवश्य ही भोगना पड़ता है ॥ १३ ॥

सुख, दुःख भय, कुशलता इत्यादि भाग्यानुसार ही मनुष्यों को प्राप्त होते हैं। अतः अदृष्ट पर विश्वास रखने वाले आप लोगों को अदृष्ट पर निर्भर रहना चाहिये ॥ १४ ॥

अब इसके बाद आप लोगों के दुःख का दूसरा कारण और बड़ा आश्चर्यजनक इतिहास के सहित कहते हैं – हे महाराज! हमारे मुख से कहा हुआ सुनो ॥ १५ ॥

अदृष्टं यादृशं पुंसां तादृशं भासते सदा ॥ अवश्यमेव भोक्तव्यमदृष्टजनितं फलम्‌ ॥ १३ ॥

सुखं दुःखं भयं क्षेममदृष्टात्‌ प्राप्यते जनैः ॥ तस्माददृष्टनिष्ठैश्च भवद्भिः स्थीयतां सदा ॥ १४ ॥

अथापरं प्रवक्ष्यामि भवतां दुःखकारणम्‌ ॥ सेतिहासं महाराज श्रूयतां मन्मुखादहो ॥ १५ ॥

श्रीकृष्ण उवाच ॥ पाञ्चालीयं महाभागा पूर्वजन्मनि सुन्दरी ॥ मेधाविद्विजमुख्यस्य पुत्री जाता सुमध्यमा ॥ १६ ॥

कालेन गच्छता राजन्‌ सञ्जाता दशवार्षिकी ॥ रूपलावण्यललिता नयनापाङ्गशालिनी ॥ १७ ॥

चातुर्यगुणसम्पन्ना पितुरेकैव पुत्रिका ॥ वल्लभातीव तेनेयं चतुरा गुणसुन्दरी ॥ १८ ॥

श्रीकृष्ण बोले – यह भाग्यशालिनी द्रौपदी पूर्व जन्म में बड़ी सुन्दरी मेधावी ऋषि के घर में उत्पन्न हुई थी। समय व्यतीत होने पर जब १० वर्ष की हुई तब क्रम से रूप और लावण्य से युक्त, अति सुन्दरी और आकर्णान्त नेत्र से शोभायमान हुई ॥ १६-१७ ॥

चातुर्य गुण से युक्त यह अपने पिता की एकमात्र इकलौती कन्या थी। अतः चतुरा, गुणवती, सुन्दरी, यह पिता की बड़ी लाड़ली थी ॥ १८ ॥

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