अध्याय ८

मेधावी ने सदा लड़के की तरह इसे माना, कभी भी अनादर नहीं किया। यह भी साहित्यशास्त्र में पण्डिता और नीतिशास्त्र में भी प्रवीणा थी ॥ १९ ॥

इसकी माता इसकी छोटी अवस्था में ही मर गई थी, पिता ने ही प्रसन्नतापूर्वक पाला-पोसा था। पास में रहने वाली अपनी सखी के पुत्र-पौत्रादि सुख को देख इसको भी स्पृहा हुई ॥ २० ॥

और तब यह सोचने लगी कि हमें भी यह सुख कैसे प्राप्त होगा? गुण और भाग्य का निधि, सुख देने वाला पति और सत्पुत्र कैसे होंगे? ॥ २१ ॥

लालिता पुत्रवन्नित्यं न कदाचित्‌ प्रलम्भिता ॥ साहित्यशास्त्रकुशला नीतावपि विशारदा ॥ १९ ॥

तन्माता स्वर्गतो पूर्वं पित्रा सा पोषिता मुदा ॥ पार्श्वलस्थालिसुखं दृष्ट्वा पुत्रपौत्रसुखस्पृहा ॥ २० ॥

तर्कयन्ती तदा बाला मामेवं च कथं भवेत्‌ ॥ गुणभाग्यनिधिर्भर्ता सुखदः सत्सुताः कथम्‌ ॥ २१ ॥

एवं मनोरथं चक्रे दैवेन ध्वंसितं पुरा ॥ किं कृत्वा किं विदित्वाऽहं कमुपास्ये सुरेश्वरम्‌ ॥ २२ ॥

किं वा मुनिमुपातिष्ठे किं वा तीर्थमुपाश्रये ॥ मम भाग्यं कथं सुप्तंः भर्ता कोऽपि न वाञ्छति ॥ २३ ॥

पण्डितोऽपि पिता मूढो मम भाग्यवशादहो ॥ विवाहकाले सम्प्राप्तेक न दत्ता सदृशे वरे ॥ २४ ॥

इस प्रकार मनोरथ विचारती हुई सोचने लगी कि पहिले मेरा विवाह उपस्थित था, परन्तु भाग्य ने बिगाड़ दिया। अब क्या करने से अथवा क्या जानने से एवं किस देवता की उपासना करने से ॥ २२ ॥

या किस मुनि के शरण जाने से अथवा किस तीर्थ का आश्रय करने से मेरी मनःकामना पूर्ण होगी। मेरा भाग्य कैसा सो गया कि कोई भी पति मुझको वरण नहीं करता है ॥ २३ ॥

पण्डित भी मेरा पिता मेरे ही दुर्भाग्य से मूर्ख हो गया है, बड़ा आश्चर्य है! विवाह का समय उपस्थित होने पर भी मेरे समान वर को पिता ने नहीं दिया ॥ २४ ॥

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