अध्याय ८

मैं अपनी सहेलियों के बीच में प्रमुख हूँ, परन्तु कुमारी होने के कारण पति दुःख से पीड़ित हूँ। जैसे मेरी सखियाँ पति-सुख को भोगनेवाली हैं वैसे मैं नहीं हूँ ॥ २५ ॥

मेरी भाग्यवती माता क्यों पहिले मर गयी? इस प्रकार चिन्ता से व्याकुल कन्या, मनोरथ रूप समुद्र के ॥ २६ ॥

मोहरूप जल में निमग्न हो शोकमोहरूप लहरों से पीड़ित हो गई। इसके पिता मेधावी ऋषि भी ॥ २७ ॥

अध्यक्षाहं सखीमध्ये कुमारी दुःखपीडिता ॥ नाहं स्वामिसुखाभिज्ञा यथा चालिगणो मम ॥ २५ ॥

मम भाग्यवती माता कथं स्वर्गं गता पुरा ॥ एवं चिन्ताकुला बाला मनोरथमहोदधौ ॥ २६ ॥

निमग्ना मोहसलिले शोकमोहोर्मिपीडिता ॥ मेधावी ऋषिराजोऽसौ विचचार महीतले ॥ २७ ॥

कन्यादाननिमित्तं च विचिन्वन्‌ सदृशं वरम्‌ ॥ तादृशं वरमप्राप्य निराशः स्वमनोरथे ॥ २८ ॥

सुतास्वकीयभाग्याभ्यां भग्नसङ्कल्पपञ्जरः ॥ अवाप दैवयोगेन ज्वरं तीव्रं सुदारुणमृ ॥ २९ ॥

स्फुटत्सर्वाङ्गसम्भिन्नतापज्वालासमाकुलः ॥ श्वाडसोच्छ्वाससमायुक्तो महादारुणमूर्च्छया ॥ ३० ॥

कन्यादान के लिये कन्या के समान वर ढूँढ़ने के हेतु देश-विदेश भ्रमण करने के लिये निकले, परन्तु कन्या के अनुरूप वर न मिलने से अपने मनोरथ में निराश हुए ॥ २८ ॥

कन्या के और अपने भाग्य से कन्या-दानरूप संकल्प के पूर्ण न होने से, दैवयोग के कारण बड़ा भारी दारुण ज्वर उन्हें आगया ॥ २९ ॥

सब अंग ऐसे फूटने लगे जैसे समस्त अंग टूट-टूट कर अलग हो जायँगे और ज्वर की ज्वाला से व्याकुल हुए श्वासोच्छ्वास लेते महादारुण मूर्च्छा से ॥ ३० ॥

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