अध्याय ८

मदिरा पान से उन्मत्त की तरह पैर लड़खड़ाते गिरते-पड़ते किसी तरह घर में आये और आते ही पृथ्वी पर गिर पड़े ॥ ३१ ॥

भय से विह्वल कन्या जब तक पिता को देखने आवे तब तक कन्या को स्मरण करते हुए मेधावी मुनि मरणासन्न हो गये। भाग्य के फलरूप बल से एकाएक काँपने लगे और कन्या-दान प्रसंग से उठा हुआ जो महोत्सव था वह जाता रहा ॥ ३२-३३ ॥

प्रस्खलन्निपपतन्भूमौ मदिरामत्तवद्‌भृशम्‌ ॥ आगच्छन्नेव भवनं स पपात धरातले ॥ ३१ ॥

यावत्सुता समायाता पितरं भयविह्वला ॥ तावन्मुमूर्षुः सञ्जातो भूसुरस्तामनुस्मरन्‌ ॥ ३२ ॥

भाविनार्थबलेनैव सहसा जातवेपथुः ॥ कन्यादानसङ्गोत्थमहोत्सवविवर्जितः ॥ ३३ ॥

अथ प्राचीनगार्हस्थ्यकृतधर्मपरिश्रमात्‌ ॥ संसारवासनां त्यक्त्वाज हरौ चित्तमधारयत्‌ ॥ ३४ ॥

सस्मार श्रीहरिं तूर्णं मेधावी पुरुषोत्तमम्‌ ॥ इन्दीवरदलश्यामं त्रिभङ्गललिताकृतिम्‌ ॥ ३५ ॥

रासेश राधारमण प्रचण्डदोर्दण्डदूराहतनिर्जरारे ॥ अत्युग्रदावानलपानकर्तः कुमारिकोत्तारितवस्त्रहर्तः ॥ ३६ ॥

तदनन्तर पहिले किये हुए गृहस्थाश्रम धर्म के परिश्रम के प्रभाव से संसारवासना को त्याग कर भगवान् में चित्त को लगाते भए ॥ ३४ ॥

उस मुमूर्षु मेधावी ऋषि ने शीघ्र ही नीलकमल के समान श्याम, त्रिवलिसे सुन्दर आकृति वाले श्रीपुरुषोत्तम हरि का स्मरण किया ॥ ३५ ॥

हे रास के स्वामी! हे राधारमण! हे प्रचण्ड भुजदण्ड से दूर से ही देवताओं के शत्रु दैत्य को मारने वाले! हे अति उग्र दावानल को पान कर जाने वाले! हे कुमारी गोपिकाओं के उतारे हुए वस्त्रों को हरण करने वाले! ॥ ३६ ॥

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