अध्याय ८

हे श्रीकृष्ण! हे गोविन्द! हे हरे! हे मुरारे! हे राधेश! हे दामोदर! हे दीनानाथ! मुझ संसार में निमग्न की रक्षा कीजिये। इन्द्रियों के ईश्वार आपको प्रणाम है ॥ ३७ ॥

इस प्रकार मेधावी के वचनों को दूर से ही सुन कर श्रीभगवान् के दूत चट-पट मुकुन्द लोक से आते हुए और उस मरे हुए मुनि को हाथ से पकड़ कर ईश्व र के चरणकमलों में ले आये ॥ ३८ ॥

इस प्रकार अपने पिता के प्राणों को निकलता देख वह कन्या हाहाकार करके रोने लगी और पिता के शरीर को अपनी गोद में रखकर अति दुःख से विलाप करने लगी ॥ ३९ ॥

श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे राधेश दामोदर दीननाथ ॥ मां पाहि संसारसमुद्रमग्नं नमो नमस्ते हृषीकेश्व राय ॥ ३७ ॥

इति मुनिवचनं निशम्य दूता झटिति समाययुर्मुकुन्दलोकात्‌ ॥ तदनुमृत मुनिं करे गृहीत्वा चरणसरोरुहमीयुरीश्वयरस्य ॥ ३८ ॥

प्राणोत्क्रमणामालोक्य हाहेति साऽरुदत्सुता ॥ अङ्के कृत्वा पितुर्देहं विललाप सुदुःखिता ॥ ३९ ॥

कुररीव चिरं सा तु विलप्यात्यन्तदुःखिता ॥ उवाच पितरं बाला जीवन्तमिव विह्वला ॥ ४० ॥

बालोवाच ॥ हा हा पितः कृपासिन्धो आत्मजानन्ददायक ॥ कस्याङ्के मां निधायाऽद्य गतोऽसि वैष्णवं पुरम्‌ ॥ ४१ ॥

चील्ह पक्षी की तरह बहुत देर तक विलाप करके अत्यन्त दुःख से विह्नल हुई और पिता को जीवित की तरह समझ कर बोली ॥ ४० ॥

बाला बोली – हाय-हाय हे पिता! हे कृपासिन्धो! हे अपनी कन्या को सुख देने वाले! मुझे आज किसके पास छोड़ कर आप बैकुण्ठ सिधारे हैं? ॥ ४१ ॥

Pages: 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10